सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

माँ, मेरा घर और यादों का एक कोना.....

भले तुम मुझसे हजारों किलोमीटर दूर हो अभी लेकिन तुम्हारी एक-एक याद को चुनकर अपने साथ यहाँ दिल्ली लेते आया हूँ "माँ"... जिस दिन मैं आ रहा था घर से, मैंने कोशिश की तुम्हारे चेहरे के भाव को पढ़ने की..एक अजीब सी बेचैनी थी तुम्हारे मुख पर, मेरे सामान बांधते हुए बार-बार पुछती थी कि अगली छुट्टी कब है। मैं तुम्हारी भावों को समझ तो रहा था और बोल दे रहा था अगले छ: माह तक कोई छुट्टी नहीं है। अगले कुछ पल के लिए तुम्हारे हाथ रूक जाते थे, लेकिन तुम बोल पड़ी वहाँ फल-दूध जरूर खाना, होटल का खाना खाकर सूख(कमजोर) जाओगे, कितने बजे सोते हो वहाँ? सबेरे सोना और सुबह चार बजे जग जाना, मैं कुछ शांति संदेश(संतमत की निकलने वाली मासिक पत्रिका) दे देती हूँ उसे वहाँ पढ़ना। मैं उसकी सारी बातों पर हाँ हाँ दोहरा दे रहा था।

मैं आज यहाँ दिल्ली में हूँ मेरे पिताजी लगभग रोज मुझसे फोन पर बात करते हैं लेकिन मेरी माँ से बात नहीं होती है लेकिन मैं जानता हूँ कि मैं जब भी पिताजी से बात कर रहा होता हूँ मेरी माँ मेरी बातों को सुनती है। मेरी माँ को मेरे पत्रकारिता की पढ़ाई करने से ऐतराज़ था, इससे पहले जूलॉजी से एमएससी करने के बाद मैं पटना में अपने भाई के साथ रहकर छपरा के राजकीय शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय से बीएड की पढ़ाई कर रहा था, मैं रोज हाजीपुर से रेलगाड़ी से छपरा आना-जाना करता था, और जैसे छुट्टियाँ मिलती थी तो मैं अपने घर चला जाया करता था। माँ कहती थी टेट(TET) पास हो ही बीएड करोगे तो शिक्षक की नौकरी मिल ही जाएगी। क्या आवश्यक्ता है पत्रकारिता करने की,

लेकिन मेरे उपर न जाने कब से पत्रकारिता का भूत सवार था, भैया के साथ रहता था तो बीएड से ज्यादा पत्रकारीय चर्चा होती थी। मैंने चुपके से आईआईएमसी का फार्म भर रखा था, पटना परीक्षा का सेंटर था। जब मेरा चयन आईआईएमसी में हो गया था तो वह समय काफी कठिन था मेरे लिए जो भी मेरे पिताजी के पास आता वही कहता खनावदोश वाली जिन्दगी होती है पत्रकारों की, बेकार है पत्रकारिता करवाना, और जब मेरी माँ ये बातें सुनती थी तो बहुत परेशान हो जाती थी। उसे लगता था कि अच्छा खासा घर के पास नौकरी मिलेगी और ये दूर जाने कि बात कर रहा है। लेकिन जब मैंने उनको बहुत समझाया तो उन्हें विश्वास हुआ कि पत्रकारिता करना भी अच्छी बात है।
दिल्ली में पाँच महीने रहने के बाद मैं दिपावली में अपने घर गया था, कैसे चुटकियों में पाँच दिन गुजरे बता नहीं सकता। मैं जिस दिन अपने गाँव से आ रहा था उस दिन भागलपुर में काली पुजा का भस़ान(विषर्जन) था, खबर मिली की सारे रास्ते जाम हैं। मुझसे ज्यादा मेरी माँ परेशान थी कि छोटू कैसे पहुँचेगा रेलवे स्टेशन? मेरे गाँव से भागलपुर की दूरी बहुत ज्यादा तो नहीं सिर्फ 20 किलोमीटर है, लेकिन उस दिन गाड़ी की कोई व्यवस्था नहीं थी, सारे वाहन बंद थे और जो चले भी थे उनका लगभग 08 किलोमीटर लम्बा जाम लगा था। मेरी गाड़ी का समय दिन के 01 बजे का था, गाड़ी थी गरीबरथ एक्सप्रेस। गाड़ी छुटती तो अगले 10 दिन तो रिजर्वेशन मिलना तो लगभग असंभव था, क्योंकि बिहार का लोक पर्व छठ दो दिन बाद था और मैं अगर रूकता तो छठ में तो रूकना ही पड़ता फिर छठ के बाद बिहार से दिल्ली आना बिना आरक्षित सीट के मतलब सांसो से दुश्मनी मोल लेना। मेरे आईआईएमसी का क्लास शुरू हो चुका था, इसलिए मैंने आने का फैसला कर लिया था।
मेरी माँ गई मेरे चचरे भाई के पास उनको बोला कि वो अपने मोटरसाईकिल से मुझे छोड़ दें। वो तैयार हो गये तो मेरी माँ के जान में जान आई कि छोटू अब पहुँच जाएगा, क्योंकि उस समय दिन के 11 बज रहे थे।
और तब से लेकर आज तक मैं बार-बार वापस उन यादों में गाहे-बगाहे पहुँच जाया करता हूँ। जीवन कितना क्रूर होता है आप कुछ पाने के लिए कितना कुछ खोते हैं।

खैर ये तो मैं अपनी माँ की प्यारी यादों के सहारे ममता के भावों में गोते लगा रहा था, तो स्वांत:सुखाय वाली इन बातों को यहाँ लगा दिया। मुझे लगता है मेरे जैसे कई लाख बेटे इसी तरह महसूस करते होंगे अपनी "माँ" को याद कर...मेरी माँ कितनी प्यारी है ना।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

जीवन की सार्थकता

लोग कहते हैं जीवन नश्वर है। बहुत से महान व्यक्तियों और संतों ने भी इस बात की सत्यता भी प्रमाणित की है। वे बड़े लोग थे उन्हें झूठलाया नहीं जा सकता- लेकिन मेरी समझ में जीवन नश्वर नहीं है। अगर नश्वर होता तो आज विश्व में मानव का आस्तित्व ही नहीं रहता। नश्वर शब्द का तात्पर्य उस वस्तु से है जिसका आस्तित्व ना रहें। किंतु मानव का आस्तित्व था, है, और रहेगा। व्यक्तिगत मृत्यु मानव का विनाश नहीं है। वह सिर्फ निरर्थक पत्तों का गिरना मात्र है। जिससे मानव रूपी वृक्ष की सुन्दरता विकृत ना हो जाय। व्यक्तिगत क्षति मेरी क्षति है। पर मानवता की नहीं...... विवेकानन्द आई आई एम सी

बिहार चुनाव को लेकर क्या है जनता परिवार की राजनीति?

विवेकानंद सिंह जनता परिवार को लेकर सबके दिमाग  में अभी बस एक ही बात आ रही होगी कि इतना हो-हल्ला और कई मीटिंग्स के दौर के बाद जब सबने एक होने का फैसला कर ही लिया तो बिहार विधानसभा चुनाव से पहले यह विलय क्यों नहीं? जब मोदी की लहर के कारण धुर विरोधी हो चुके दो भाई गले मिलने को तैयार हो ही गए तो अब आखिर क्या समस्या हो गई? क्या लालू-नीतीश के रिश्तों में फिर से दरार आ गई? क्या पप्पू और मांझी का इसमें कोई फैक्टर तो नहीं है? लेकिन सवालों से इतर हकीकत यही है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में राजद-जदयू के विलय से बेहतर विकल्प उनके लिए गठबंधन ही है। राजद के एक नेता से मेरी बात हुई तो उनका कहना था कि उनके लिए सीटों की संख्या से बड़ा मसला 16 वीं बिहार विधान सभा चुनाव में बीजेपी को सत्ता तक पहुँचने से रोकना है। बीजेपी के नेता ने कहा कि इनकी आपसी लड़ाई के बीच हम 175 का आंकड़ा छूने में कामयाब होकर रहेंगे। खैर हार-जीत का पता तो चुनाव के बाद ही चलेगा लेकिन जनता परिवार में बिहार विधानसभा चुनाव से पहले इस हलचल पर मशहूर नारा याद आ रहा है “अभी तो ये अंगड़ाई है आगे और लड़ाई है”। देखना दिलचस्प होगा क...

यूपीएससी में बही आरक्षण की उल्टी गंगा

नई दिल्ली/ विवेकानंद सिंह देश में आरक्षण को लेकर अक्सर बहस होती रहती है। जति के आधार मिलने वाले आरक्षण पर भी कई तरह के सवाल उठते रहते हैं। क्या आरक्षण का जाति के आधार पर होना उचित है? तर्क दिया जाता है कि गरीबी तो हर एक जाति में होती है। क्या आरक्षण के जरिए सही में अक्षम लोग चुन लिए जाते हैं? तर्क दिया जाता है इससे गुणवत्ता प्रभावित होती है। लेकिन संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के द्वारा लिए जाने वाले एसिस्टेंट कमांडेंट के रिजल्ट में कुछ ऐसा देखने को मिला है जिससे आरक्षण की मूल अवधारणा ही प्रभावित हो रही है। यूपीएससी द्वारा आयोजित की जाने वाली सेन्ट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्स (एसिस्टेंट कमांडेंट) परीक्षा 2014 के फाइनल कट ऑफ मार्क्स में ओबीसी श्रेणी का कट ऑफ मार्क्स जेनरल से भी ज्यादा है। जेनरल की श्रेणी में चयन के लिए जहाँ 294 नंबर की जरूरत दिखाई गई है वहीं ओबीसी कोटे में चयन के लिए 296 नंबर की जरूरत बताई गई है। इस लिस्ट को देखकर समझ में नहीं आ रहा है कि यहां आरक्षण का कौन सा प्रावधान लागू किया गया है? आखिर पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने के बाद भी उसकी मेरिट समान्य श्रेणी से 2 अंक ...