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दुविधा में दोनों गये न समय बचा न पैसा.....

हम पत्रकारिता के छात्रों को अक्सर अपना दैनिक कार्य एक योजना के तहत करना पड़ता है, लेकिन समय और परिस्थिति के प्रभाव में सारी योजनाएँ कैसे बेकार हो जाती है?......उसी का एक अनुभव आज हमें प्राप्त हुआ।
रात सर्द हो, पेट में जोरों से भूख लगी हो और हम अपनी बनाई योजना के तहत दुविधा के दोराहे पर खड़े होकर अपनी किस्मत को कोसें तो अनुभव थोड़ा खट्टा तो हो ही जाता है। 
डीटीसी की नान ए सी एवं ए सी बस,
भाई साहब नॉन ए सी बस में चलेंगे तो 30रू. की बचत होगी, चार दिन के द हिन्दु न्यूज पेपर की कीमत निकल जाएगी, यह बातें करते हुए हम तीनों बस स्टॉप की तरफ बढ़ रहे थे। मेरे साथ ओमप्रकाश धीरज और गोविन्द कृष्ण थे। हम तीनों सीएमएस वातावरण द्वारा आयोजित पर्यावरण फिल्म महोत्सव की रिपोर्टिंग करने इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, गये थे।

 लौटते समय हम भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार बस स्टॉप पर खड़े हो गये। हमें 615 नम्बर की पूर्वांचल जाने वाली नॉन ए सी बस का इंतजार था। खड़े रहते हुए अभी मात्र पाँच मिनट ही हुए थे कि 615 नम्बर की ए सी बस आ गई, हम खुश होकर उस गाड़ी को आँखों के सामने से गुजरते हुए देख रहे थे। अगले 10 मिनट के बाद दूर से पीले-पीले अक्षरों में 615 लिखा अंक आँखों से टकराया पल में हमारे आँखों की चमक भी तेज हो गई, लेकिन जैसे गाड़ी करीब आई तो उसका लाल रंग मानों हमारे अंतर मन पर चोट कर गया। आखिर 15रू. प्रति व्यक्ति की जगह 25रू. प्रति व्यक्ति किराया देना हम छात्रों के लिए थोड़ा कष्टकारी हो जाता है। हमने इस उम्मीद में कि कुछ देर में हरी वाली गाड़ी आ जाएगी ये सोचते हुए उस गाड़ी को भी छोड़ दिया। आगे जो हमने महसूस किया उसका हमें तनिक भी एहसास ना था।

और यहीं हम चूक कर गये, दिन रविवार का हो तो दिल्ली में वैसे भी गाड़ीयों कि फ्रिक्वेंसी में कमी आती है। अब हमारा इंतजार शुरू हुआ, एक लम्बा इंतजार जो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी। दूर से हर आती गाड़ी पर स्टेंड में अपने सीट से खड़ा हो जाता और कहता शायद ये 615 ही है लेकिन वो गाड़ी जैसे हमारी रेटिना रेंज में आता सारे भ्रम चकनाचुर हो जाते थे। रह-रह कर मैं गोविन्द भाई से कहता कि ये लि मेरिडियन होटल देख रहे हैं, कैसे रोशन हो रहा है उसका दरो-दिवार फिर कुछ पल चुप हो जाता। देखते-देखते एक घंटे बीत गये और अब तो 615 की ना हरी आ रही थी ना लाल... ओम भाई ने कहा ये चंद रूपये बचाने की क्या सोची अपना बहुमूल्य समय ठंड भरी रात में बस स्टेन्ड पर बिताना पड़ रहा है।

हमारा सब्र जुबान से टूटता जा रहा था, एक पल मन किया कि चलो इंडिया गेट भ्रमण किया जाय तभी एक और 615 नम्बर वाली बस दिख पड़ी। हम खुश थे लेकिन गाड़ी हरी नहीं फिर से लाल ही थी, समय रात के 8.00 बजने वाले थे। हमने एक दूसरे की ओर देखा बिना कुछ कहे गाड़ी में प्रवेश कर गये। हम बस का कुछ किराया बचाना चाहते थे वो तो लगी ही भूख के मारे हालत खराब हुई वो अलग..... हमारी सारी योजना तो धरी की धरी रह गई।
जब हम तीनों बेर सराय में खाना खा रहे थे....मुस्कराते हुए बोल पड़े "दुविधा में दोनों गये समय बचा न पैसा"।

विवेकानंद सिंह... 

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