कहानी कुछ अनसुलझी है, बस बात ये है कि हम सुलझाने के क्रम में और उलझ गये हैं।
कुछ दिनों से हमारे एक दोस्त के जीवन में यकायक उठा-पटक का दौर शुरु हो गया, जहाँ उसे सबसे ज्यादा खुशी मिलती थी वहीं से उसे सबसे ज्यादा निराशा हाथ आने लगी, वो इतना परेशान हुआ की उसकी तबियत तक बिगड़ गई, सच्चाई का तो मुझे पता नहीं लेकिन कहानी का चित्रण हो तो एक अच्छी फिल्म हो सकती है।
प्यार तो कई बार मुझे अबूझ पहेली की तरह लगती है, लाख बार ना चाह लो लेकिन जिससे होना है, वो होकर ही रहता है, कभी किसी की सादगी भा जाती है, तो कभी किसी अदाएँ लुभा जाती हैं। हाँ एक महत्वपूर्ण बात यह है कि प्यार का मिलन हो ही जाए इसकी कोई गारंटी नहीं है।
चूंकि भारत का समाजिक ताना-बाना काफी उलझा हुआ है।
हम महापुरूषों के जन्मदिनों पर बड़ी-बड़ी बातें तो कर लेते हैं लेकिन जब अपनी बेटी की शादी दूसरे जात के लड़के से करने की बात सामने आती है तो हमारी पेशानी पर बल पड़ने लगता है।
मैं देश के उन लोगों की बात कर रहा हूँ, जो वाकई में मध्यम वर्गी हैं,
मैं जिस संस्थान में पढ़ रहा हूँ वहाँ के एल्यूमनाई को "कैम्पस वाले कपल अवार्डस" से भी सम्मानित किया गया है। स्वाभाविक है कि इस पढ़ाई के बाद अक्सर लोग अपने-अपने पैरों पर खड़े हो जाते हैं, यदि मन के माफिक का कोई जीवन साथी मिल जाए तो एतराज किसको होगा?
तुम चाहो तो चलो मेरे साथ
हमराह बनो थाम लो मेरा हाथ
मैं साया बनकर रहूँगा सरे राह
हमसफर बन दे दो मेरा साथ....।।

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