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पत्रकारिता-समय और संघर्ष!!

पत्रकारिता यूं तो कहने के लिए बड़ा ही नोबल प्रोफेशन है, और कुछ हद तक यह सच भी है। यह एक ऐसा मंच है जहाँ से आप न सिर्फ अपनी बात बड़े पैमाने पर कह सकते हो, साथ ही साथ अपनी नज़र से लोगों को दुनिया के अलग-अलग रंग-रूप भी दिखा सकते हो।

ये तो पत्रकारिता तक की बात थी, लेकिन एक सच्चे और अच्छे पत्रकार के जीवन में जब घुस कर देखिएगा तो वो बड़ा अजीब अनुभव देगा। उसका अपना जीवन ठीक उस दिये जैसा दिखेगा, जिसके कारण रौशनी तो होती है लेकिन उसके अपने चारों तरफ अँधेरा होता है।

इसलिए ऐसे साथी जिनके पास पत्रकारिता को लेकर एक स्पष्ट दूर दृष्टी नहीं हो वो इस पेशे में न ही आयें तो बेहतर होगा। पत्रकारिता का स्वरुप बदलते बदलते इतना बदल गया है कि कभी-कभी पत्रकार को एहसास होता है वो पत्रकारिता नहीं पी आर कर रहे हैं।

आजादी के बाद से तकनीक ने भी पत्रकारिता करने के ढंग को बदला। जब से इंडिया में टी वी की पत्रकारिता शुरू हुई तब से यह फील्ड ग्लैमरस होता गया, और खास तौर पर युवाओं को इसने अपनी ओर आकर्षित किया। अब पत्रकार बनने की जगह युवा एंकर बनने के सपने देखने लगे, वही सपना लिए वो आई आई एम सी, जामिया और अन्य प्राइवेट मीडिया स्कूल की तरफ चले आए।

वहां के शिक्षकों ने जब हकीकत से रूबरू कराया तो उन जैसे सोच वाले साथियों के दिल को बड़ा धक्का लगा। उसके बाद जब पत्रकारिता की डिग्री लेकर बाहर निकले और एक इंटर्नशिप के लिए संघर्ष शुरु हुआ तो बचा खुचा सपना भी हाथ में आ गया।

इण्डिया में टीवी पत्रकारिता के जनक में से एक स्वर्गीय एस पी सिंह जिन्होंने आज तक नाम से एक बुलेटिन दूरदर्शन के लिए बनाया था।प्रभाष जोशी जो जनसत्ता के आधार स्तम्भ रहे इन जैसे लोगों को पढ़ जान लेना जरुरी है। तब आप जब तुलना करेंगे की आजादी के बाद देश में कितने नए समाचार पत्र आए और कितने न्यूज़ चैनल तो बदलते परिदृश्य का सही आंकलन सम्भव हो पायेगा। आज न्यूज़ चैनल की भूमिका दिन ब दिन बढ़ती गई, मेरे बाबूजी को तो लगता है कि टीवी में न दिखो तो पत्रकार क्या, बार-बार समझाता हूँ, कि वही सिर्फ पत्रकारिता नहीं है, लेकिन वो कहाँ मानने वाले टीवी पर आकर अटक जाते हैं।

मेरे जानने वाले एक नेता जी से हमारी बात हो रही थी उन्होंने हमसे कहा कि इस लोकसभा चुनाव में टीवी चैनल का जो रवैया और असर रहा है। ऐसे में आगे आने वाले दिनों सभी पार्टी इसमें बहुत पैसे लगाएगी। खास तौर पर उन्होंने कांग्रेस का नाम लिया।

तो यह हो सकता है कि आने वाले दिनों में पत्रकारिता के क्षेत्र में जॉब तो बहुत हों, लेकिन एथिक्स को एक कोने में रखना पड़ सकता है।

रही बात संगठन के अंदर के माहौल की तो निराश लोगों से मिलने पर निराशा हाथ आएगी, सफल लोगों से मिलने पर उर्जा और उत्साह।

ये सारी बातें अनुभव आधारित हैं किसी किसी की किस्मत एक्सेप्शन होती है। हां ये बात उन लोगों पर एकदम लागू नहीं होती जिनके पास अपना पत्रकारीय विज़न है। उन्हें इस फील्ड में मज़ा आएगा, रोज-रोज नई चुनोतियाँ उन्हें अवसर सी लगेंगी।

चूँकि आज हमारे संस्थान आई आई एम सी के लिखित परीक्षा का परिणाम आया है। कई ऐसे साथी भी मेरी मित्र सूचि में हैं जिन्होंने इस परीक्षा में सफलता पाई है। उनमें से एक ने पूछा कि साक्षात्कार के प्रश्न क्या हो सकते हैं? मैंने कहा एक तो पक्का रहेगा कि आप पत्रकारिता क्यों करना चाहते हो? और पत्रकारिता से आपकी क्या अपेक्षाएं हैं? अब उन्हें तो मैं शुभकामनायें ही दे सकता हूँ।

नोट:- कोई भी संस्थान किसी को पत्रकार नहीं बना सकती है। वो आप स्वयं ही बन सकते हैं, संस्थान आपको तराश कर. तीक्ष्ण और तीव्र जरुर बना देगी। गुरु द्रोन मिले तो एक आध अर्जुन भी जरुर बनेंगे।।

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