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जिन्दगी धूप और छांव

समन्दर सभी को प्यासा रख देती है,
खजूर और ताड़ के बड़े-बड़े वृक्ष राहगीरों को छांव नहीं दे पाते हैं।
लेकिन "ये जिन्दगी" हमें सब कुछ दे सकती है, धूप, छांव, गम, खुशी न जाने और क्या-क्या?

सुबह से ही मन थोड़ा बेचैन और दुखी था, तब और बहुत दुखी हो गया जब खबर सुनी कि नांदेड़ की तरफ जा रही एक पैसेंजर रेलगाड़ी और स्कूल बस के टक्कर से 19 बच्चों की जानें चली गई। उन छोटे-छोटे बच्चों की तस्वीरें जब मैंने फेसबुक पर देखी तो हृदय भाव विह्वल हो गया, आँखों से आंसू की धारा बह गई। उन बच्चों में मुझे मेरा बचपन दिख रहा था, जो उस समय तड़प और बिलख रहा था।

मैं सोच से सागर में बार-बार डुबकी लगाने की कोशिश करता, लेकिन सागर मुझे हर बार प्यासा ही बाहर निकलने पर मजबूर कर देता। आखिरी किसकी गलती रही होगी? कई बार मैंने ऐसे लोगों को देखा है जो मानव रहित फाटक ही नहीं, फाटक लगे होने पर भी अपनी साईकिल लिए या, पैदल उस पार निकल जाने की जल्दी में होते हैं। उस समय उसकी नादानी पर खीज़ और गुस्सा तो आता ही था। मन ही मन बूदबूदा भी देता था, चढ़ जाए तब पता चलेगा।

इस पल की खामोशी में जो दर्द है, उसने मेरे मन को मेडक जिला पहुँचा दिया है। जहाँ मैं उन माँ-पिताओं के सपने को रौंदे जाते हुए देख रहा हूँ। उन बच्चों के बदले उनको पाँच-पाँच लाख की राहत राशि मिली, क्या करेंगे इसका? आखिर उसी बच्चे के लिए तो पाँच-पाँच रूपए जुटाकर प्राइवेट स्कूल में दाखिला कराया था। पढ़-लिख नाम रोशन करेगा।

किसी की जल्दबाजी ने तो आज उन माँओं की रोशनी ही छीन ली, अब वह रोज किसके लिए टिफिन बनाएगी, बार-बार घड़ी की तरफ देखना भूल जाएगी वह, आखिर कोई वजह तो हो एक लापरवाही ने तो जीने की वजह ही छीन ली।

मेरी माँ से जब मैंने एक दिन कहा कि क्यों इतनी परेशानी उठाती हो, अब बुढ़ापा आ गया सब खेत भौली(बटाई) पर दे दो, और आराम करों सतसंग और भजन करो, जो उपज होगी उसमें पेट भर जाएगा तुम दोनों का। उनका जवाब था बेटा मेरी जिन्दगी तो तुम्हीं लोग हो, जिस दिन से तुम्हारी दीदी, भैया और तुम आए उस दिन से ही मैं अमर हो गई। अब तो मैं तुमलोगों की जिन्दगी के लिए जी रही हूँ। जब तक शरीर चल रहा है काम कर रहीं हूँ। तुमलोग अपने पैर पर अच्छे से खड़े हो जाओगे, तो छोड़ देंगे सबकुछ। 

उदास कदमों से ऑफिस से निकल ही रहा था कि तभी कुछ ऐसा हुआ जिससे मैं इन सारे दर्दों को भूलकर माया की दुनिया में खो गया। शायद वो मेरी अपनी खुशी थी। मैं इंसान हूँ शायद स्वार्थी इंसान जो कुछ पल पहले रो रहा था, लेकिन ऐसा कुछ हुआ कि वह खुश था, मुस्कुरा रहा था।

कमरे पर पहुँचते ही सारे गम भूलाकर खुशी बांटने लगा, यह जिन्दगी की वो हकीकत थी जिसे मैं जी रहा था। किसी ने कहा है खुशी बांटने से बढ़ जाती है इसलिए अपनी खुशी बढ़ा रहा था। इंसान के खुशी और गम की एक वाजिव वजह का पता चल रहा था मुझे उस समय। अगर जीवन में जहां तक का सोचा है वह नहीं मिले तो इंसान दुखी रहता है और जो सोचा नहीं हो और वह यकायक मिल जाए तो खुशी होती ही है।

जीवन में एक बात हमेशा कौंधती है कि आखिर सारे रंगों में काला रंग ही सबसे बुरा क्यों माना जाता है?

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