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दफ्तर के अंदर बैठे पत्रकार की यात्रा

छोड़ रहा हूँ इकबार फिर से तुझे ऐ दिलवाले शहर...
लेकिन मेरे अनुभव की किताब का चौराहा तो तूं ही होगा।


मुझे लगता है कि मैं बिल्कुल देशी मॉडल का एक शहरी आदमी हूँ। अक्सर जिस किराये के मकान में रहता हूँ उसे अपना ही घर समझने की भूल कर लेता हूँ, जिस कंपनी में काम करता हूँ वह कंपनी मुझे अपनी ही लगने लगती है। लेकिन यकायक जब ये सबकुछ छूटने को होता है तो मैं बार-बार फ्लेशबैक में चला जाता हूँ और यादों की फिल्म आभासी परदे पर मेरे सामने से किसी परछाई की तरह गुजरने लगती है।

कुछ ऐसा ही वक्त था जब मैं आई-नेक्स्ट समाचारपत्र की नौकरी (कानपुर) को छोड़ रहा था लेकिन तब मुझे इस बात की खुशी थी कि मैं अपने दोस्तों के बीच दिल्ली लौट रहा हूँ। फिर यहाँ दिल्ली आकर एक नई वेबसाइट से जुड़ना और चार लोगों की लॉचिंग टीम का हिस्सा बनना अपने-आप में कमाल का अनुभव था। हमलोगों ने कई ईमानदार कोशिशें की लेकिन तब हमारी स्टोरी को 100 लोग भी पढ़ लेते थे तो हमारे अंदर एक सुकून का भाव आ जाता था।

वह दिन शायद ज्यादा खुशी का था जब हमने देखा कि किसानों के मुद्दे पर लिखे गए एक आलेख को अबतक तीन हजार से ज्यादा लोग पढ़ चुके हैं। एक पल के लिए तो आश्चर्य हुआ परंतु जब पता किया तो देखा कि हिन्दी टीवी चैनल के प्राइम टाइम किंग रवीश कुमार ने उस स्टोरी को अपने फेसबुक वॉल पर शेयर किया है। लेकिन एक वह दिन था और एक आज का दिन है हमारी इस नई वेबसाइट के पाठक बढ़ते ही जा रहे हैं। अब haritkhabar.com की खबरें गूगल न्यूज पर भी दिखती हैं। मुझे उम्मीद है कि वहाँ के मेरे साथी दबी-दबाई गई स्वरों और ख़बरों को आवाज देते रहेंगे।

यादों की बारात के बीच इस बार नौकरी छोड़ते हुए मैं अपने गृह प्रदेश (पटना) में जाकर पत्रकारिता करने को लेकर उत्साहित भी हूँ। वहाँ अपने परिवार के लोगों के आस-पास रहने की खुशी भी है, लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता ये मुस्कुराता हुआ आदमी कुछ पल के लिए उदास भी हो जाता है।

परंतु अब मैं एक निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि दिल्ली एक ऐसा चौराहा है जहाँ से होकर हम पत्रकारों की गाड़ी ऐसे ही आती और जाती हैं, इसलिए दिल्ली हमेशा के लिए अपना साथी है। देश के दिल में समाये दिल्ली की प्रतिदिन बदल जाने वाली भीड़ में ऐसे तो खुद को बार-बार तलाशना काफी मजेदार होता है। ऐसा लगता है जैसे तारों से भरे आकाश में ये तारा कहीं खो सा गया हो। यहाँ की गलियाँ, ऑटो, बसें, मेट्रो और भीड़ सबकुछ वही रहती हैं लेकिन हर यात्रा में यात्री बदल जाते हैं।

हाँ इस इंटरनेट का शुक्रगुजार रहूँगा जो कि पटना में रहते हुए भी मेरे दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में रहने वाले दोस्तों के लिए संवाद के फाटक को खोलकर रखेगी। चलिए दोस्तों यायावरी और फकीरी की इस दुनिया में अब हमारा नया पता प्रभात ख़बर (पटना) होगा। बस आप सभी की शुभकामनाएँ बनी रहे।

विवेकानंद सिंह
08860533197

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