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'कैंसर का गढ़' बनता जा रहा है पश्चिमी उत्तर प्रदेश

विवेकानंद सिंह
अगर आपसे कोई यह कहे कि आपका कैंसर गढ़ में स्वागत है तो आप क्या कहेंगे? इसे सुनने के बाद आपका सोच में पड़ जाना स्वाभाविक होगा, लेकिन यह एक हकीकत है। पूरे देश के कैंसर विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए कैंसर एक महामारी बन चुका है। यहाँ के हालात इतने खराब हो चुके हैं कि बीते दो साल में सिर्फ कैंसर की वजह से यहाँ सैंकड़ों जानें गई हैं और साथ ही हजारों इससे प्रभावित हैं।


आंकड़ें जो कहानी नहीं बयां कर रहे हैं वो और भी खतरनाक हैं। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम के तहत जनगणना पर आधारित कैंसर रोगियों के आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में बाकी भारत की तुलना में कैंसर के पीड़ित 16 प्रतिशत अधिक है। आंकड़ों के मुताबिक 2011 में कैंसर के 10.55 लाख मामले सामने आए। इसमें से 1.71 लाख लोग उत्तर प्रदेश के मूल निवासी थे।


राम मनोहर लोहिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, लखनऊ के रेडियोलॉजिस्ट और डॉक्टरों के अनुसार सरकारी आंकड़े प्रतीकात्मक है। हकीकत में कैंसर के रोगियों की संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है। मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल में ईएनटी विभाग में आने वाले ओरल कैंसर के मरीजों में लगभग एक-तिहाई यूपी के होते हैं। इन मरीजों की संख्या हफ्ते में 250, महीने में 1000 और साल में 12 हजार तक बढ़ जाती है। इसी तरह के आंकड़ें एम्स में भी देखे जा सकते हैं।


खास तौर से राजधानी दिल्ली से सटे एनसीआर में भी कैंसर तेजी से पैर पसार रहा है। ग्रेटर नोएडा से लेकर बागपत के बीच 300 से ज्यादा गांव इस खतरनाक बीमारी की चपेट में हैं। इस पूरे इलाके से बहने वाली हिंडन नदी की खतरनाक स्थिति का खुलासा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में दाखिल अपने हलफनामे में किया है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण समिति ने कहा है कि हिंडन की सहायक नदियां कृष्णा और काली नदी का पानी भी पूरी तरह से दूषित हैं। सीपीसीबी ने हलफनामा दाखिल कर कहा है कि हिंडन नदी का पानी इतना दूषित है कि अब यह नहाने-धोने के योग्य भी नहीं रहा। बागपत के गांव में लोगों में हो रहे कैंसर दूषित पानी पीने की वजह से हो रहा है।


कल-कारखानों से निकलने वाले कचरे को बिना शोधित किए हुए नदी में प्रवाहित किए जाने की यह समस्या विकराल रूप धारण करती जा रही है। यह क्षेत्र की सबसे प्रदूषित पट्टी है जहां दिल्ली और गाजियाबाद के कई टन सीवेज से दोनों प्राइमरी वॉटर सिस्टम यमुना और हिंडन प्रदूषित हो गई है। साथ ही इन क्षेत्रों में आर्सेनिक की मात्रा भी पाई गई है, इसके भूमिगत जल में घुल जाने कारण इस पानी के प्रयोग से सेहत को गंभीर खतरे हो रहे हैं। इस वजह से भी त्वचा, फेफड़ों, मूत्राशय और गुर्दे के कैंसर केसेज सामने आए हैं।

प्रदेश के बुलंदशहर के सिकंदराबाद ब्लॉक के गांव धनौरा गांव में एक दशक में 45 से ज्यादा लोग कैंसर से मर चुके हैं। इसमें सबसे ज्यादा मौतें डेढ़ साल के भीतर हुई हैं। कैंसर इस इलाके के संसाधनों को भी प्रभावित कर रहा है। यह बीमारी लोगों को अपनी कृषि भूमि बेचने पर भी मजबूर कर रही है। कैंसर की वजह से बागपत जैसे जगहों की इकॉनोमी पर भी काफी बुरा प्रभाव पड़ा है।


पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान नेता और किसानों की समस्या पर आवाज उठाने वाले महेंद्र सिंह टिकैत की मृत्यु भी आंत के कैंसर के कारण हुई थी। 76 वर्ष की उम्र में 2011 के मई महीने में मुजफ्फरनगर में उनकी मृत्यु हुई थी। प्रदेश में ऐसे कईयों जाने कैंसर के गाल में समा चुकी है।


प्रदेश सरकार ने भी अभी तक कैंसर को मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया है, जिसका नतीजा है कि प्रदूषण फैलाने वाले जमकर प्रदूषण फैलाये जा रहे हैं और आम-आवाम को इसकी सजा मिल रही है। सिर्फ बागपत में यमुना किनारे के गांव सांकरोद और फैजपुर निनाना, काली नदी (कृष्णा) के किनारे बसे गांगनौली और रहतना तथा हिंडन किनारे भड़ल और निरपुड़ा के ग्रामीणों में लिवर व आंत के कैंसर के मामले काफी बढ़े हैं, जबकि टीकरी, हिम्मतपुर, सूजती, बरनावा, पुरा, मिलाना, धनौरा और झुंडपुर में भी कैंसर लगातार अपने पैर पसारता जा रहा है।


ग्रेटर नोएडा से बागपत तक लोग लिवर और आंतों के कैंसर के सबसे ज्यादा शिकार हो रहे हैं। इसकी मुख्य वजह फैक्ट्रियों से निकलने वाला पारा व सीसा युक्त गंदे पानी का भूजल में मिलना है। हिंडन व काली नदी में कम पानी तथा घरेलू सीवरेज व औद्योगिक मिलों का केमिकल युक्त गंदा पानी भी इसकी वजह हैं। एक समय की जीवनदायिनी कही जाने वाली काली नदी अब कई गांव के लोगों के लिए पलायन का कारण बन गई है। पिछले कुछ सालों में कई परिवार गांव को छोड़कर जा चुके हैं।


हालांकि यह एक सच्चाई है कि कैंसर एक विश्वव्यापी बीमारी है लेकिन प्रदेश में प्रदूषण के अलावा कैंसर के मामलों के बढ़ने का एक कारण तंबाकू का सेवन भी है। वहीं महिलाओं में कैंसर के बढ़ते मामलों के लिए बदलती जीवनशैली, देर से शादी और गर्भधारण करने को भी जिम्मेदार माना जाता है। देश के निवासियों को कैंसर जैसे जानलेवा रोग से बचाने की वक्त की मांग को इस तथ्य से आंका जा सकता है कि हर साल देश में 10 लाख से ज्यादा लोग कैंसर की चपेट में आते हैं। चिंता की की बात यह है कि 2025 तक यह आंकड़ा 5 गुना हो जाएगा। विकसित देशों में कैंसर का प्रसार 25 प्रतिशत है वहीं भारत जैसे विकासशील देशों में इसका प्रतिशत 75 है।


विकास की ओर कदम बढ़ाने को इच्छुक पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोग कैंसर की चपेट में आते जा रहे है। सरकार की लापरवाही और कारखनों की मनमानी ने नोएडा, गाजियाबाद से लेकर बागपत तक एक “कैंसर कॉरिडोर” बनने को मजबूर कर दिया है। यह इस विकासशील प्रदेश की एक भयावह सच्चाई है, इससे दूर भागने की न सही बचने की कोशिश तो अवश्य हो सकती है।
   


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