विवेकानंद सिंह
पहले तो सिर्फ बिहार जाने वाली रेल गाड़ियों के देरी से चलने और रद्द हो जाने की सूचनाएँ मिलती थी, लेकिन पिछले कुछ महीनों से पूरे देश में गाड़ियां देरी से चलने लगी है। आखिर भारत की रेलवे को हो क्या गया है? हम बताते हैं कि भारतीय रेलवे को क्या हुआ है? पूर्व रेलमंत्री लालू प्रसाद मजाक में रेलवे के बारे में एक बात बोला करते हैं कि रेलवे एक “जर्सी काऊ” यानी कि दुधारू गाय है। लेकिन सही मायनों में रेलवे एक दुधारू गाय है।
पहले तो सिर्फ बिहार जाने वाली रेल गाड़ियों के देरी से चलने और रद्द हो जाने की सूचनाएँ मिलती थी, लेकिन पिछले कुछ महीनों से पूरे देश में गाड़ियां देरी से चलने लगी है। आखिर भारत की रेलवे को हो क्या गया है? हम बताते हैं कि भारतीय रेलवे को क्या हुआ है? पूर्व रेलमंत्री लालू प्रसाद मजाक में रेलवे के बारे में एक बात बोला करते हैं कि रेलवे एक “जर्सी काऊ” यानी कि दुधारू गाय है। लेकिन सही मायनों में रेलवे एक दुधारू गाय है।
बड़ी से बड़ी कंपनियों से लेकर उद्योगपतियों की इच्छा रेलवे में अपने व्यापार की भागीदारी सुनिश्चित करने की रहती है। रेलवे के एक अधिकारी के मुताबिक, बड़े-बड़े उद्योगपति सरकार पर दबाव बना रहे हैं कि रेलवे को इग्नोर किया जाए ताकि लचर व्यवस्था होते ही रेलवे में निजी निवेश की बातें हों। पूरे भारत में रेल पटरियों के दोहरीकरण और तिहरीकरण के लिए निवेश की जरूरत को लेकर रेल मंत्री सुरेश प्रभु अपनी बात कह चुके हैं।
रेलवे भारत की एक ऐसी इंडस्ट्री है जिस पर सबकी नजर ऐसे टिकी है जैसे किसी कौए की नजर मांस के टुकड़े पर टिकी होती है। ऐसे में उद्योगपति इस इंडस्ट्री पर कब्जा करने के लिए किसी हद तक जा सकते हैं। बेहतर सुविधाओं की बात करके और सरकारी व्यवस्था को नाकारा साबित करके यह कंपनियां कोई भी दांव लगा सकती है। केंद्र की मोदी सरकार के आने के पहले तक रेलवे सिर्फ सरकारी तेल कंपनियों से डीजल खरीदती थी जिनके घाटे की भरपाई भी सरकार करती थी। लेकिन अब रिलायंस और एस्सार ऑयल समूह जैसी कंपनियां भी रेलवे को तेल बेच रही है।
वैसे भी भारत के लोगों को ख्वाब दिखाना बड़ा आसान होता है। मुंगेरी लाल के हसीन सपने में खो जाने वाली देश की जनता जहाँ स्विट्जरलैंड जैसे रेलवे स्टेशनों और बुलेट ट्रेन के सपनों में खोई है वहीं बड़े-बड़े उद्योग घराने इन्हीं सपनों को बेच कर अपनी तिजोरी भरने के फेर में हैं। अगर ऐसा हुआ तो रेलवे के राष्ट्रवाद का क्या होगा? क्योंकि रेलवे महज एक सेक्टर नहीं है यह एक सिस्टम है। अभी इस पूरे सिस्टम को खोखला बनाने और बताने कोशिश की जा रही है ताकि जनमानस को लगे कि सच में रेलवे को भी पब्लिक सेक्टर से ज्यादा प्राइवेट होना चाहिए। हाल ही में इटारसी में ऑटोमेटिक सिग्नलिंग सिस्टम में आग लगने के बाद से सिग्नलिंग सिस्टमों के पास स्मोक एंड फायर डिटेक्शन सिस्टम लगाए जाने की बात की जा रही है। सही मायनों में भारत ऐसे हादसों के बाद जागने वाला मुल्क है।
कहने को तो भारतीय रेलवे पूरी दुनिया में जन सामान्य को यात्रा कराने के मामले में प्रथम स्थान पर है और मालभाड़े में रेलवे का पूरी दुनिया में चौथा स्थान है। ऐसे में रेल यात्रियों को सुरक्षित यात्रा कराने का दायित्व रेलवे की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन अब तक जितनी सरकारें रही हैं लगभग सभी ने रेलवे रूपी इस जर्सी काऊ का जमकर दोहन किया है। नीति निर्धारक बड़ी पूंजी के लोभ में देश की संपदा को कॉर्पोरेट हाथों में सौपने के लिए लालायित नजर आते हैं, लेकिन वृहद पैमाने पर इसके परिणाम की चिंता कौन करता है? अगर यही स्थिति रही तो वह दिन दूर नहीं जब अपने बेजार होने का रोना रो-रो कर एक दिन भारतीय रेल भी बुलेट ट्रेन का स्वप्न लिए किसी उद्योगति के कदमों की दासी बन चुकी होगी।
आलेख हरित खबर में प्रकाशित
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