सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

बाबा नागार्जुन : ठेठ, देशज और घुमक्कड़ जनकवि की जनयात्रा

कई दिनों तक चूल्हा रोया चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उसके पास
कई दिनों तक लगी भींत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त
 
दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआं उठा आंगन से ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठीं घर-भर की आंखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पांखें कई दिनों के बाद

अकाल के दौरान की उदासी, लाचारगी और बेबसी तथा अकाल के बाद की उम्मीद एव खुशी का इतना सूक्ष्म और हार्दिक चित्रण सिर्फ नागार्जुन जैसे जनकवि की कलम ही कर सकती थी। हिन्दी भाषा के सबसे सच्चे जनकवि बाबा नागार्जुन काजन्म 30 जून 1911 को उनके ननिहाल मधुबनी जिला के सतलखा गांव में हुआ था। उनका अपना गांव तरौनी है जो कि दरभंगा जिला के अंतर्गत आता है। ऐसे तो बाबा नागार्जुन का असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था परंतु वो हिन्दी में ‘नागार्जुन’ तथा मैथिली में ‘यात्री’ उपनाम से रचनाएँ करते थे। बाद में ‘‘बाबा” के नाम से विख्यात, प्रगतिवाद के सशक्त स्तम्भ साथ ही एक ऐसी शख्सियत जिन्हें नागार्जुन नाम से संपूर्णता मिली। आज बाबा नागार्जुन के जन्म को 104 वर्ष हो चुके हैं।

ठेठ देशज गुणों में निखरे हुए बाबा नागार्जुन का जन्म एक अशिक्षित खेतिहर परिवार में हुआ था। इनके पिता गोकुल मिश्र नागार्जुन को ‘ठक्कन’ कहकर पुकारा करते थे। इनकी आरंभिक शिक्षा संस्कृत में हुई, आगे की शिक्षा स्वाध्याय पर आधारित थी । राहुल सांकृत्यायन के “संयुक्त निकाय” का अनुवाद पढ़कर वैद्यनाथ की इच्छा हुई कि यह ग्रंथ मूल पालि में पढ़ा जाए। इसके लिए वे लंका चले गए जहाँ वे स्वयं पालि पढ़ते थे और मठ के “भिक्खुओं” को संस्कृत पढ़ाते थे। यहाँ उन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा ले ली और यहीं इनको नागार्जुन नाम मिला। युवा अवस्था तक आते-आते ही बाबा नागार्जुन सनातनी संस्कृति से छुटकारा पाने के लिए छटपटाने लगे थे। ब्राह्मण परिवार में जन्मे बाबा अपने चारों तरफ पसरी सामाजिक कुरीतियों से आजीवन लोहा लेते रहे।

उनको मैथिली, हिन्दी और संस्कृत के अलावा पालि, प्राकृत, बांग्ला, सिंहली, तिब्बती आदि अनेक भाषाओं का ज्ञान था । निराला के बाद नागार्जुन अकेले ऐसे कवि हैं, जिन्होंने इतने छंद, इतने ढंग, इतनी शैलियाँ और इतने काव्य रूपों का इस्तेमाल किया है। उनकी अभिव्यक्ति का ढंग तिर्यक भी है, बेहद ठेठ और सीधा भी। उनकी कविता में एक प्रमुख शैली स्वगत में मुक्त बातचीत की शैली है”।

सन् 1930 में 19 वर्ष की आयु में अपराजिता से नागार्जुन का विवाह हुआ। फक्कड़पन बाबा का हमेशा साथी रहा। विवाह के बाद भी उनके जीवन का पहले से चला आ रहा घुमक्कड़पन जारी रहा। बाबा इस चिर-परिचित फक्कड़ी और मस्ती के बावजूद एक बैचेन कवि हैं। भाषा पर उनका असाधारण अधिकार नज़र आता है। उनपर साहित्य आकादेमी ने एक वृतचित्र बनाया है आपलोग भी उस वृत्तचित्र को देखिए। बाबा को विश्वास था कि आने वाली पीढि़यां शोषण से मुक्त हो जाएंगी। उनकी लेखनी शोषण के खिलाफ एक ऐलान की तरह है। बाबा की जयंति पर उनको नमन…
 
प्रस्तुति- विवेकानंद

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

जीवन की सार्थकता

लोग कहते हैं जीवन नश्वर है। बहुत से महान व्यक्तियों और संतों ने भी इस बात की सत्यता भी प्रमाणित की है। वे बड़े लोग थे उन्हें झूठलाया नहीं जा सकता- लेकिन मेरी समझ में जीवन नश्वर नहीं है। अगर नश्वर होता तो आज विश्व में मानव का आस्तित्व ही नहीं रहता। नश्वर शब्द का तात्पर्य उस वस्तु से है जिसका आस्तित्व ना रहें। किंतु मानव का आस्तित्व था, है, और रहेगा। व्यक्तिगत मृत्यु मानव का विनाश नहीं है। वह सिर्फ निरर्थक पत्तों का गिरना मात्र है। जिससे मानव रूपी वृक्ष की सुन्दरता विकृत ना हो जाय। व्यक्तिगत क्षति मेरी क्षति है। पर मानवता की नहीं...... विवेकानन्द आई आई एम सी

बिहार चुनाव को लेकर क्या है जनता परिवार की राजनीति?

विवेकानंद सिंह जनता परिवार को लेकर सबके दिमाग  में अभी बस एक ही बात आ रही होगी कि इतना हो-हल्ला और कई मीटिंग्स के दौर के बाद जब सबने एक होने का फैसला कर ही लिया तो बिहार विधानसभा चुनाव से पहले यह विलय क्यों नहीं? जब मोदी की लहर के कारण धुर विरोधी हो चुके दो भाई गले मिलने को तैयार हो ही गए तो अब आखिर क्या समस्या हो गई? क्या लालू-नीतीश के रिश्तों में फिर से दरार आ गई? क्या पप्पू और मांझी का इसमें कोई फैक्टर तो नहीं है? लेकिन सवालों से इतर हकीकत यही है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में राजद-जदयू के विलय से बेहतर विकल्प उनके लिए गठबंधन ही है। राजद के एक नेता से मेरी बात हुई तो उनका कहना था कि उनके लिए सीटों की संख्या से बड़ा मसला 16 वीं बिहार विधान सभा चुनाव में बीजेपी को सत्ता तक पहुँचने से रोकना है। बीजेपी के नेता ने कहा कि इनकी आपसी लड़ाई के बीच हम 175 का आंकड़ा छूने में कामयाब होकर रहेंगे। खैर हार-जीत का पता तो चुनाव के बाद ही चलेगा लेकिन जनता परिवार में बिहार विधानसभा चुनाव से पहले इस हलचल पर मशहूर नारा याद आ रहा है “अभी तो ये अंगड़ाई है आगे और लड़ाई है”। देखना दिलचस्प होगा क...

यहां सरकारी स्कूलों के 'शिक्षक' बने हैं 'मैनेजर'

विवेकानंद सिंह सरकारी स्कूलों में मिलनेवाली शिक्षा की गुणवत्ता की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। खास तौर से बिहार के सरकारी स्कूलों में काम करनेवाले शिक्षक आजकल गजब के मैनेजर बन गये हैं। हो सकता है आपको मेरी बातें थोड़ी अजीब लगे, लेकिन यह एक सच्चाई है। पढ़ाने के अलावा अपनी नौकरी बचाने के लिए व कम सैलरी को बेहतर बनाने के लिए उन्हें कई तरह से खुद को और छात्रों के अटेंडेंस को मैनेज करना पड़ता है। उन्हें हर दिन बच्चों के बिना स्कूल आये भी, उनका अटेंडेंस बनना पड़ता है। इसमें हेडमास्टर साहब (प्रधानाध्यापक) से लेकर शिक्षक भी एक-दूसरे की मदद करते नजर आते हैं। हालांकि, वे भ्रष्ट नहीं, बल्कि बस मैनेज कर रहे होते हैं, क्योंकि उनके ऊपर बैठे प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी, जिला शिक्षा पदाधिकारी का काम भी सिर्फ अपनी सैलरी से तो नहीं चल पाता है। दरअसल, वे लोग भी मैनेज कर रहे होते हैं। क्योंकि, सबसे खास बात यह है कि बच्चों के पिता खुद ही मैनेज कर रहे होते हैं। वे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की चाह में अपने बच्चे को ट्यूशन देते हैं, प्राइवेट टाइप स्कूल में पढ़ने भेजते हैं, लेकिन सरकारी सिंड्रोम से ग्रस्त हो...