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उत्तर प्रदेश की राजनीति के युवा तुर्क

संपूर्ण क्रांति आंदोलन के समय एक नारा काफी मशहूर हुआ था, “जिस ओर जवानी चलती है, उस ओर जमाना चलता है”। अक्सर युवा मन विद्रोही होता है, उसके अंदर बदलाव का बीज पनप रहा होता है। कई विचारकों का मत रहा है कि युवाओं के हाथ में अगर सत्ता की स्वतंत्र बागडोर मिले तो बदलाव तय है। उत्तर प्रदेश की जनता ने अखिलेश यादव को चुनते हुए शायद कुछ ऐसा ही सोचा होगा कि इनके आने से उत्तर प्रदेश की राजनीति में युवापन आ जाएगा। लेकिन तब किसको यह मालूम था यूपी को एक सीएम के रहते चार लोग संभालेंगे।

जैसे डॉक्टर बनने के लिए मेडिकल की पढ़ाई करनी होती है, इंजीनियर बनने के लिए इंजीनियरिंग की लेकिन युवाओं को राजनीति में आने के लिए अलग से कोई स्कूलिंग नहीं करनी होती है। वक्त, परिस्थितियाँ और माहौल किसी को भी नेता बना देते हैं। भारतीय राजनीति में एक बात जो कमाल की नजर आती है वह ये कि 30-35 वर्ष उम्र के लगभग सभी सांसद या सक्रिय नेता अपने परिवार-पिता की विरासत को आगे ले जा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश की राजनीति का युवापन खोजने पर हम पाते हैं कि बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती जब पहली बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थी तो वह तब की सबसे युवा मुख्यमंत्री थी। मायावती 39 साल की उम्र में उत्तर प्रदेश की सबसे युवा मुख्यमंत्री बनी थीं। लेकिन 2012 में हुए 16वीं विधानसभा चुनाव में सपा के युवा चेहरा बनकर उभरे अखिलेश यादव 38 साल की उम्र में सूबे के अब तक के सबसे कम उम्र के सीएम बने। इनके अलावा अगर प्रदेश में युवा राजनीति की तालाश हो तो लीडिंग भूमिका में अमेठी से सांसद और कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी, राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के राष्ट्रीय महासचिव और पूर्व सांसद जयंत चौधरी और भाजपा के महासचिव और सुल्तानपुर से सांसद वरूण गांधी का नाम प्रमुख तौर पर सामने आता है।

अखिलेश यादव (समाजवादी पार्टी)


अखिलेश का जन्म 1 जुलाई 1973 को हुआ। मुलायम सिंह यादव और मालती के पुत्र अखिलेश की स्कूली पढ़ाई धौलपुर (राजस्थान) के सैनिक स्कूल में हुई। उसके बाद उन्होंने मैसूर के जेसी इंजीनियरिंग कॉलेज से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। मैसूर के बाद अखिलेश पर्यावरण इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए ऑस्ट्रेलिया चले गए। लेकिन जब लौटकर आए तो उन्हें सिविल इंजीनियरिंग से ज्यादा उत्तर प्रदेश की राजनीति भायी।

आज से 15 साल पहले 26 साल की उम्र में अखिलेश ने सक्रिय राजनीति में कदम रखा था। वो साल 2000 में कन्नौज से उपचुनाव जीतकर पहली बार लोकसभा पहुंचे अखिलेश ने 2004 और 2009 में भी इस सीट पर जीत दर्ज की। इस बीच मुलायम ने अखिलेश को प्रदेश संगठन की कमान सौंपते हुए प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। सपा और कल्याण सिंह की दोस्ती तोड़ी गई। विधानसभा चुनाव के पहले जब आजम खान और शिवपाल यादव जैसे पार्टी दिग्गजों ने बाहुबली डीपी यादव और मुख्तार अंसारी को पार्टी में शामिल करने का प्रयास किया तो अखिलेश ने उसका कड़ा विरोध किया। इसी का नतीजा रहा कि अखिलेश सूबे के मुख्यमंत्री बनने में कामयाब रहे। लेकिन आज प्रदेश की विधि और व्यवस्था चरमराई हुई है, आए दिन पत्रकारों पर जानलेवा हमले हुए हैं। राजनीति का युवापन कहीं गुम सा हो गया है।

राहुल गांधी (कांग्रेस)

राहुल गांधी का जन्म 19 जून 1970 में हुआ था। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के पुत्र राहुल की प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली के सेंट कोलंबस स्कूल में हुई। इसके बाद वो प्रसिद्ध दून स्कूल में पढ़ने चले गये। इसके बाद राहुल ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के रोलिंस कॉलेज फ्लोरिडा से साल 1994 में अपनी कला स्नातक की उपाधि प्राप्त की। फिर 1995 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कॉलेज से एमफिल की उपाधि प्राप्त की।

राहुल गांधी ने अपने राजनीतिक कैरियर की शुरुआत 2004 से की जब वह अमेठी से पहली बार सांसद चुने गए। 45 साल के हो चुके राहुल गांधी के बारे में एक राय बनती है कि वे राजनीति में देर से आए। कांग्रेस उन्हें प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में देखती है। उत्तर प्रदेश कभी कांग्रेस की सियासत का केंद्र होता था लेकिन आज कमोवेश यहाँ की राजनीति कांग्रेस के हाथों से फिसलती जा रही है। चूंकि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस नेतृत्व विहिन मालूम पड़ती है। अगर राहुल गांधी कांग्रेस के नेता के तौर पर यूपी की राजनीति की बागडौर संभालने की सोचें तो हो सकता है कि कांग्रेस की वापसी हो सके। फिलहाल तो राहुल गांधी यूपी से ज्यादा राष्ट्रीय राजनीति पर नजर जमाए बैठे हैं।

जयंत चौधरी (रालोद)

जयन्त चौधरी का जन्म 27 दिसम्बर 1978 को हुआ था। जयंत फिलहाल राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के राष्ट्रीय महासचिव हैं। अमेरिका में जन्मे जयंत चौधरी रालोद के अध्यक्ष अजित सिंह के बेटे और चौधरी चरण सिंह के पौत्र हैं। जयंत चौधरी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में मजबूत पकड़ रखने वाले नेताओं में शामिल हैं। आने वाले समय में जयंत देश की किसान राजनीति का भी युवा चेहरा बन सकते हैं।

लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स से स्नातक जयंत को उत्तर प्रदेश की राजनीति के संभावनाशील राजनेता के तौर पर देखा जाता है। 2009 में पहली बार लोकसभा चुनाव जीते जयंत चौधरी 16 वीं लोकसभा में मथुरा से चुनाव हार गए थे। हालांकि पूरे उत्तर प्रदेश के हिसाब से रालोद का वोट प्रतिशत कम रहता हो लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रालोद को मजबूत माना जाता है।

वरूण गांधी (भाजपा)

वरूण गांधी का जन्म 13 मार्च 1980 को हुआ था। इंदिरा गांधी के पौत्र और मेनका गांधी व संजय गांधी पुत्र  वरूण भाजपा से सांसद हैं। वरूण गांधी जब मात्र 3 महीने के थे तभी एक विमान दुर्घटना में उनके पिता की मौत हो गई थी। 16वीं लोकसभा में वरूण ने सुल्तानपुर से जीत हासिल की है। भाजपा के युवा फायर ब्रांड नेता के तौर अपनी छवि बनाने वाले वरूण फिलहाल भारतीय जनता पार्टी में सबसे युवा राष्ट्रीय महासचिव हैं। इससे पूर्व वरूण गांधी पीलीभीत से सांसद रह चुके हैं।

कई बार अपने बयानों के कारण विवाद में आए वरूण ने 2004 में भाजपा की सदस्यता ली थी। वरूण पीलीभीत से सुल्तानपुर होते हुए अब शाहजहाँपुर की तरफ राजनीतिक कूच करते दिख रहे हैं। फिलहाल प्रदेश में भाजपा के युवा तुर्क रूप में वरूण गांधी राजनीति की राह में अग्रसर हैं। वरुण गांधी ने अपने संसदीय क्षेत्र सुलतानपुर विधानसभा के दूबेपुर ब्लाक के ढकवा (सोमनाभार) को आदर्श ग्राम के रूप में चुना है।

बसपा में युवा नेतृत्व का आभाव

मायावती की पार्टी बसपा में युवा नेतृत्व का सीधा आभाव नज़र आता है अगर उपरोक्त युवा नेताओं की श्रेणी में बसपा के नेता तलाशें जाएं तो कोई नाम नहीं सूझता है। यही कारण है कि राजनीतिक कैरियर का सबसे बुरा वक़्त देख रही मायावती ने उत्तर प्रदेश में फिर सत्ता हासिल करने के लिए युवाओं पर नज़रें टिकाई हैं। मायावती ने आदेश दिया है कि पार्टी में हर स्तर पर समितियों में 35 साल तक की उम्र के कम से कम 50 फ़ीसदी सदस्य होने चाहिए। इसके लिए नए सिरे से भर्ती की जानी चाहिए। यह पहला मौका है जब बसपा में युवाओं को महत्व दिया जा रहा है। पार्टी की कमान मायावती के हाथ में आने के बाद से ही पार्टी में कभी कोई युवा या छात्र संगठन नहीं रहा और न ही कभी किसी युवा नेता का नाम सुना गया।

आगे आने वाले विधानसभा चुनाव में इन नेताओं की भूमिका अहम रहने वाली है क्योंकि कोई भी पार्टी आज के मौजूदा दौर में बिना युवा छवि के आगे नहीं बढ़ सकती है। उत्तर प्रदेश की राजनीति का युवापन बना रहे इसके लिए जरूरी भी है कि स्वतंत्र रूप से युवा नेतृत्व की भागीदारी बढ़े। बाकी युवाओं की भागीदारी राजनीति कितनी बढ़ पाती है यह तो समय ही बता पाएगा।

प्रस्तुति- विवेकानंद सिंह
आलेख हरित खबर में प्रकाशित

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