नई दिल्ली/ विवेकानंद सिंह
देश में आरक्षण को लेकर अक्सर बहस होती रहती है। जति के आधार मिलने वाले आरक्षण पर भी कई तरह के सवाल उठते रहते हैं। क्या आरक्षण का जाति के आधार पर होना उचित है? तर्क दिया जाता है कि गरीबी तो हर एक जाति में होती है। क्या आरक्षण के जरिए सही में अक्षम लोग चुन लिए जाते हैं? तर्क दिया जाता है इससे गुणवत्ता प्रभावित होती है।
लेकिन संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के द्वारा लिए जाने वाले एसिस्टेंट कमांडेंट के रिजल्ट में कुछ ऐसा देखने को मिला है जिससे आरक्षण की मूल अवधारणा ही प्रभावित हो रही है।
यूपीएससी द्वारा आयोजित की जाने वाली सेन्ट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्स (एसिस्टेंट कमांडेंट) परीक्षा 2014 के फाइनल कट ऑफ मार्क्स में ओबीसी श्रेणी का कट ऑफ मार्क्स जेनरल से भी ज्यादा है। जेनरल की श्रेणी में चयन के लिए जहाँ 294 नंबर की जरूरत दिखाई गई है वहीं ओबीसी कोटे में चयन के लिए 296 नंबर की जरूरत बताई गई है। इस लिस्ट को देखकर समझ में नहीं आ रहा है कि यहां आरक्षण का कौन सा प्रावधान लागू किया गया है? आखिर पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने के बाद भी उसकी मेरिट समान्य श्रेणी से 2 अंक ऊपर कैसे चली गई?
गौरतलब है कि सरकारी सेवाओं और संस्थानों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं रखने वाले पिछड़े समुदायों तथा अनुसूचित जातियों और जनजातियों से सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। केंद्र द्वारा 22.5% सीटें अनुसूचित जाति (दलित) और अनुसूचित जनजाति (आदिवासी) के लिए आरक्षित हैं (अनुसूचित जातियों के लिए 15%, अनुसूचित जनजातियों के लिए 7.5%) वहीं ओबीसी के लिए 27% आरक्षण का प्रावधान है।
आरक्षण का मूल उद्देश्य विशेष अवसर देने को लेकर है, लेकिन मौजूदा परिणाम देखकर कुछ गड़बड़ी की आशंका की जा सकती है। नियमतः अगर किसी भी आरक्षित कोटे में आने वाला समान्य श्रेणी के कट ऑफ मार्क्स के बराबर या ज्यादा नंबर लाता है तो उसका चयन स्वतः समान्य श्रेणी में हो जाएगा। ऐसी परिस्थिति में संभव ही नहीं है कि ओबीसी का कट ऑफ मार्क्स समान्य श्रेणी से कम हो। यूपीएससी की सााइट पर इस रिजल्ट का कट ऑफ देखने के लिए यहाँ क्लिक करें।
आलेख हरित खबर में प्रकाशित
आलेख हरित खबर में प्रकाशित
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें