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नरेंद्र मोदी के डीएनए वाले बयान पर नीतीश कुमार का पलटवार

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक माहिर राजनीतिज्ञ हैं। ऐसे में वो कोई दांव चलें और उसमें राजनीति नहीं हो ये कैसे हो सकता है?उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डीएनए वाले बयान को बड़ा मुद्दा बना लिया है।

नीतीश ने ऐलान किया कि वे आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद के साथ मिलकर मंगलवार से शब्द वापसी अभियान शुरू करेंगे और उनके इस अभियान से जुड़कर लगभग पचास लाख लोग प्रधानमंत्री को अपना डीएनए सैंपल भेजेंगे। नीतीश कुमार को इंतजार था कि पीएम मोदी अपने गया रैली में डीएनए से संबंधित बयान को वापस लेंगे लेकिन 9 अगस्त की रैली में मोदी ने इस मामले पर पूरी चुप्पी बनाए रखी।

नीतीश ने ‪‎डीएनए‬ वाले मुद्दे को सूक्ष्मता से जांच-परख कर उठाया है। बिहार में नीतीश कुमार की असली ताक़त अति पिछड़ा समुदाय के अंतर्गत आने वाले वोट हैं। वैसे माना यह भी जाता है कि नीतीश कुमार स्वयं देसवाल कुर्मी (धानुक) हैं जो कि बिहार की अति पिछड़ी समुदाय का हिस्सा है। ऐसे में अपने डीएनए को बिहारी अस्मिता से जोड़कर नीतीश कुमार इन वोटरों को अपनी ओर बनाये रखने की जुगत में हैं। चूँकि लालू प्रसाद के साथ आने से इन जातियों के युवा वोटर विद्रोह के मूड में नज़र आ रहे हैं। क्योंकि माना जाता है कि बिहार में राबड़ी देवी के अंतिम 5 वर्षों के शासनकाल के दौरान अगर सबसे ज्यादा पीड़ित कोई समुदाय रहा है तो वो यही समुदाय रहा है। बिहार की राजनीति में अगड़ों के बाद यही समुदाय लालू को सीधे तौर पर पसंद नहीं करता है। ऐसे में मोदी का यह बयान नीतीश के लिए संजीवनी साबित हो सकता है।

नीतीश ने सत्ता में आने के बाद से अति पिछड़ा समुदाय का सर्वमान्य नेता बनने की पुरजोर कोशिश की जिसमें वे सफल भी रहे। अति पिछड़े को नौकरियों में अतिरिक्त आरक्षण और पंचायत चुनाव में आरक्षण देकर नीतीश इस समुदाय के बीच हीरो बन गए। यहाँ तक कि मोदी लहर वाले लोकसभा चुनाव में भी इन्हीं वोटरों के साथ का असर रहा कि जदयू को बिहार में 16 फीसदी वोट आये। बिहार भाजपा भी इस बात को भली-भांति जानती है कि आगामी विधानसभा चुनाव के दौरान लगभग 90 फीसदी अगड़े और वैश्य उनको वोट करने जा रहे हैं। इसलिए वो अपनी उपलब्धियों से ज्यादा लालू प्रसाद के तथाकथित जंगलराज के डर को प्रचारित करने में लगी है। क्योंकि ऐसा करने से जो भी ट्रान्सफर्ड वोट उसके खेमे में आएगा वह बोनस ही होगा।

नीतीश ने मौके की नजाकत को समझते हुए 25 जुलाई को मोदी द्वारा कही बात पर 5 अगस्त को पीएम मोदी को चिट्ठी लिखा था। ये इस बात की ओर इशारा करता है कि यह सोच-समझ कर लिया गया कदम है। अब नीतीश कुमार इस मुद्दे को व्यापक रूप देने का प्रयास कर रहे हैं। इसको लेकर 29 अगस्त को पटना के गांधी मैदान में एक स्वाभिमान रैली भी आयोजित की जाएगी। हो सकता है कि बिहार के एक हिस्से को मोदी द्वारा नीतीश के डीएनए को ख़राब बताना ना अखरे लेकिन, नीतीश की नज़र जिन लोगों तक अपनी बात पहुँचाने की है वो उसे भुनाने का भरदम प्रयास कर रहे हैं और वे इसमें सफल भी नज़र आ रहे हैं। नीतीश कुमार ने अपनी ओर से आक्रमक रूख अपना कर मोदी के आक्रमक चुनाव प्रचार के तरीके को भी सेंसर करने की एक कोशिश की है।

इन राजनीतिक दांव से यह स्पष्ट हो रहा है कि नीतीश कुमार इस विधानसभा चुनाव में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं। भाषण देने के क्रम में कुछ भी बोल जाने वाले नरेन्द्र मोदी को आगे ज्यादा सावधान रहना होगा क्योंकि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तकनीक से तस्वीर तक रिस्पांड कर रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी की अगली रैलियाँ सहरसा और भागलपुर में होनी है। देखना दिलचस्प होगा कि नीतीश के इस दांव पर मोदी का क्या स्टैंड रहता है?

विवेकानंद सिंह


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