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मोदी की विदेश यात्राएँ और दूर से आती ढोल की आवाज

विवेकानंद सिंह

हमारे गाँव में अक्सर ये कहावत सुनने को मिल जाती है, “दूर का ढोल बड़ा सुहाना लगता है”। पिछले साल के जून महीने से हमारे देश के लोगों को भी कुछ ऐसा ही सुहाना-सुहाना सा महसूस हो रहा होगा। देश के प्रधानमंत्री जब विदेश से देश के लोगों को संबोधित करेंगे तो देश के लोगों का सीना गर्व से तन जाना लाज़मी है। क्यों सच हैं न?

हमारे देश के प्रधानमंत्री भी कमाल हैं वो विदेश जाकर अपने आलोचकों को जवाब देते हैं। उन्हें जो भी कहना होता है वो वहाँ से कहते हैं, वो वहाँ से ही अपने देश के लोगों को ये एहसास दिलाने की कोशिश करते हैं कि वो तो इतने कर्मठ हैं कि रविवार को भी काम करते हैं। लेकिन इन सबके बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक साल के अंदर अपने विदेश दौरे पर बिताए दिनों के अर्धशतक का रिकार्ड बनाने से चूक गए। हालांकि कई मीडिया रिपोर्ट उनके विदेश में रहे दिनों की अवधि में यूएन की यात्रा को शामिल कर संख्या को अर्धशतक के पार बता रहे हैं।

प्रधानमंत्री मोदी 26 मई 2014 से लेकर 18 मई 2015 तक के 357 दिनों में 49 दिन विदेश में रहे। फिर भी यह रेकार्ड अब तक के किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री का बेस्ट विदेशी परफॉर्मेंस है। पीएम मोदी की विदेश यात्रा का औसत प्रति माह 1 से ज्यादा देशों का बैठता है इन्होंने छह महीनों में ही नौ देशों की यात्रा की थी। मोदी इन 357 दिनों में दो बार की नेपाल यात्रा समेत अबतक 18 देशों की यात्रा कर चुके हैं। वहीं बात अगर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह की करें तो उनका सलाना विदेश यात्रा का औसत 7 रहा है। मनमोहन सिंह के दस साल के कार्यकाल को देखा जाए तो 2004 से 2014 के दौरान उन्होंने 40 देशों के 70 से ज्यादा दौरे किए थे। मोदी सरकार में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के बारे में यह राय बनी हुई है कि उन्हें विदेश मंत्रालय देकर किनारे कर दिया गया है लेकिन इस दौरान सुषमा ने पीएम मोदी से ज्यादा 21 देशों की यात्रा की है।

हम यहाँ बेकार में प्रधानमंत्री मोदी की विदेश दौरों की आलोचना नहीं करेंगे। लेकिन यह जानना जरूरी है कि प्रधानमंत्री के इन विदेश दौरों से हमें और हमारे देश को क्या हासिल हुआ? और क्या हासिल हो सकता था जो कि नहीं हो पाया? इन दौरों से उन मुल्कों और हमारे देश के बीच आपसी रिश्ते में कितना सुधार आया? एक तरफ सरकार प्रधानमंत्री के विदेश दौरों को अपनी उपलब्धि बताने में लगा है, तो दूसरी तरफ विपक्ष सरकार को इस मुद्दे पर घेरने के मूड में है। यहाँ सरकार की खुशी भी जायज मालूम पड़ती है और विपक्ष के सवाल भी, क्योंकि जब देश में किसान आत्महत्या कर रहे थे तब देश के प्रधानमंत्री फ्रांस में राफेल लड़ाकू विमान की डील करने में व्यस्त थे। पीएम मोदी के हर विदेश दौरे से पूर्व ही उस देश के साथ किसी डील की खबर आई ताकि वो सुर्खियों में रहे, लेकिन डील हमेशा सुर्खी से कम ही रहे।

यात्रा का श्री गणेश हुआ भूटान से
मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में ये बताने की कोशिश कर दी थी कि वो विदेश नीति को लेकर कुछ ज्यादा ही गंभीर हैं। उन्होंने सार्क देशों के सभी नेताओं को शपथ समारोह में बुलाया और अपने कार्यकाल के पहले ही दिन सभी सार्क देशों से द्विपक्षीय वार्ता की थी। मोदी ने अपनी पहली विदेश यात्रा के रूप में सार्क देशों के सदस्य भूटान को चुना। जब भी कोई बड़ी इकॉनोमी अपने से छोटे इकॉनोमी की तरफ हाथ बढ़ाता है तब वह अपने-आप के उदार होने का संकेत देता है। मोदी का भूटान चयन कुछ ऐसा ही फैसला था। मोदी ने भूटान पहुँचकर नारा दिया भारत फ़ॉर भूटान, भूटान फ़ॉर भारत। भूटान से भारत को सबसे बड़े लाभ की उम्मीद जलविद्युत परियोजनाओं से की जा सकती है। इस यात्रा से दोनों देशों के संबंध में मजबूती आने की उम्मीद है।

ब्रिक्स के बहाने ब्राजील पहुँचे पीएम
पीएम मोदी 13 जुलाई 2014 को ब्रिक्स सम्मलेन में शामिल होने लिए ब्राज़ील गए। वहाँ पीएम ब्राज़ील, रूस, साउथ अफ्रीका और चीन के नेताओं के साथ द्विपक्षीय वार्ता में शामिल हुए। इस दौरे की प्रमुख उपलब्धियों में एक रही ‘ब्रिक्स डेवलपमेंट बैंक’ इसे बनाने को लेकर ब्रिक्स देश राज़ी हुए। हालांकि डिप्लोमेटिक रूप से बड़ी सफलता चीन के हाथ लगी जबकि इसका मुख्यालय चीन के शंघाई में बनना तय हुआ। लेकिन इंटरनेशनल प्लेटफॉर्म पर यह भारत की सफलता मानी गई। भारत ने चीन को इस बात के लिए राज़ी कर लिया कि इस बैंक में सभी सदस्य देशों की बराबर हिस्सेदारी होगी।

नेपाल में 17 साल बाद पड़े भारतीय पीएम के कदम
नेपाल हमारे देश के इतने करीब होते हुए भी हमारे प्रधानमंत्रियों के लिए हमेशा दूर बना रहा। लेकिन 17 साल के लंबे अंतराल के बाद पीएम मोदी 3 अगस्त 2014 को नेपाल के दौरे पर गए। इस दौरान पीएम मोदी ने नेपाल के विकास के लिए 1 अरब डॉलर के मदद की भी घोषणा की। पीएम मोदी नवंबर के महीने में 3 दिन के लिए फिर से नेपाल गए थे। पिछले दिनों नेपाल ने भयावह त्रासदी को झेला, इस घड़ी में भी भारत मदद को आगे आया।

बुलेट ट्रेन की आस लिए पीएम पहुँचे जापान
मोदी का जापान दौरा कुछ हद तक मिला-जुला रहा। जापान दौरे को लेकर सरकार द्वारा बड़े-बड़े हवाई किले बनाने की कोशिश की गई थी। लेकिन जापान जितना उत्साह मोदी के स्वागत में दिखाया उसके वनिस्पत 35 अरब डॉलर के छोटे निवेश की घोषणा हुई। जापान के साथ न्यूक्लियर डील की कोशिश भी बेकार रही। भारत में बुलेट ट्रेन चलाने और स्मार्ट सिटी बनाने में मदद की पेशकश तो जापान ने स्वीकार तो कर लिया, लेकिन भारत की जर्जर रेलवे और ओल्डेस्ट सिटीज को स्मार्ट बनाने में वो अब भी कतरा रही है। जापान में पीएम मोदी ने गजब-गजब के करतब दिखाए वहाँ कुछ पल के लिए तो मोदी ड्रमर बन गए थे।

अमेरिका के दौरे पर काम से ज्यादा हुआ हल्ला
मोदी के लिए सबसे अहम विदेश दौरों में से एक अमेरिका का दौरा रहा। अमेरिका के दौरे पर ओबामा के साथ मोदी की मुलाकात चर्चा में रहा। साउथ चाइना सी के मुद्दे का उठाया जाना भी अहम रहा। इस दौरान मोदी ने अमेरिकी बिजनेस कम्युनिटी को लुभाने का भरपूर प्रयास किया। मोदी के अमेरिका दौरे को इंडियन मीडिया में गज़ब का कवरेज मिला। एक पल को ऐसा एहसास हो रहा था कि अमेरिका भारत पर इतना मेहरबान हो जाएगा कि नरेन्द्र मोदी के साथ पोटली में बंद करके अच्छे दिन भेज देगा। भारत के अपेक्षित कई ऐसे समझौते रहे दो वहाँ नहीं हो पाए जैसे, भारत और अमेरिका के बीच डब्ल्यूटीओ और फूड सब्सिडी, भारतीय सर्विस सेक्टर, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स और असैन्‍य परमाणु सहयोग जैसे विवादास्पद मुद्दों पर दोनों देशों में आम सहमति नहीं बन पाई।

हालांकि मनमोहन सिंह की कॉग्रेस सरकार द्वारा बनाए रिश्तों को आगे ले जाने में पीएम मोदी को कामयाबी मिली है। मोदी ने इस दौरे में अमेरिका के मेडिसन स्क्वॉयर में एक मेगा शो किया, उसके जरिए मोदी ने अप्रवासी भारतीयों को देश की ओर देखने को कहा। अमेरिका के साथ व्‍यापार, जलवायु परिवर्तन और असैन्‍य परमाणु करार जैसे विवादित मुद्दों पर मोदी ने अपने व्‍यावहारिकता का परिचय दिया है। वहीं अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने टाइम पत्रिका में भारतीय प्रधानमंत्री मोदी का परिचय लिखकर मोदी को सुधारवादी नेता बताकर अपनी मंशा जाहिर कर दी।

परमाणु से बुद्ध तक सबको हासिल करने की हुई कोशिश
विदेश यात्रा के दौरान पीएम मोदी की नज़र सिर्फ विदेशी पूंजी पर ही नहीं भारत से जुड़ी संस्कृति के साथ अपने रिश्ते को दर्शाने पर भी रही। म्यांमार, ऑस्ट्रेलिया फिजी, सेशल्स, मॉरिशस, श्रीलंका और सिंगापुर के दौरों के दौरान मोदी ने खुद को मजबूती से पेश किया। ऑस्ट्रेलिया में भी अमेरिका की नकल करने की कोशिश हुई। वहीं भारत से सटे एशियाई देशों के साथ मोदी सरकार ने बुद्ध डिप्लोमेसी का नमूना प्रस्तुत किया। इस कदम से दो राष्ट्राध्यक्षों के बीच पारस्परिक आपसी रिश्ते भी मजबूत होते दिखे।

फ्रांस, जर्मनी और कनाडा के दौरों से मोदी के हिस्से जितना आना था वो तो नहीं आया लेकिन फ्रांस में राफेल डील और जैतापुर न्यूक्लियर पावर प्लांट की बात हो, या फिर जर्मनी में मेक इन इंडिया के नारे के साथ हनोवर व्यापार मेले का सहयोगी बनना या कनाडा से परमाणु ईंधन पर करार होना। इसे मोदी सरकार की सफलता ही मानी जा सकती है। लेकिन यह वो वक्त था जब देश को पीएम की ज्यादा जरूरत थी और देश के पीएम सैर पर थे।

चीन से कितने करीब और कितने दूर?
पीएम मोदी का चीन दौरा हमारे आपसी रिश्तों से ज्यादा व्यापार के रिश्तों की मजबूती की ओर इशारा कर रहा है। ये भी एक हकीकत है चीन के साथ हमारे व्यापारिक रिश्ते तो आज भी जारी हैं। पीएम मोदी और चीनी समकक्ष के बीच बॉर्डर डिस्प्यूट पर कोई खास चर्चा नहीं हुई। पाकिस्तान और चीन हमारे दो ऐसे पड़ोसी हैं जिनके साथ हम अपने रिश्ते सुधरने की आस लगाए बैठे रहते हैं लेकिन बार-बार सीमा का मुद्दा हमारे रिश्ते को तल्ख कर देता है। जैसे पाकिस्तान के साथ खेल के जरिए रिश्ता बेहतर बनने की उम्मीद की जाती है वैसे चीन के साथ द्विपक्षिय व्यापार के जरिए रिश्तों में बेहतरी की आश रहती है।

चीन को अब निवेश के लिए नए बाजार चाहिए क्योंकि वह खुद अब लगभग डेवलप्ड की श्रेणी तक पहुँच चुका है। साथ ही उसके पास रिजर्व विदेशी पूंजी को भी उसकी बढ़ाने की इच्छा है ऐसे में भारत के साथ व्यापार की पहल उसके लिए अच्छे नतीजे ला सकती है। मोदी के इस दौरे के दौरान भारत और चीन के बीच 22 अरब डॉलर के 24 व्यापारिक समझौते हुए हैं। यह समझौते अक्षय ऊर्जा, बंदरगाहों के विकास, वित्त और औद्योगिक पार्कों समेत अन्य कई क्षेत्रों में किए गए हैं। इन समझौतों से सबसे ज्यादा अडाणी ग्रुप और भारती ग्रुप को लाभ मिलने की उम्मीद है। पीएम मोदी चीन यात्रा के अगले क्रम में मंगोलिया से होते हुए दक्षिण कोरिया पहुँच चुके हैं। मोदी ने मंगोलिया की धरती पर कदम रख कर एक कीर्तिमान तो बना ही दिया है उन्होंने मंगोलिया जाने वाले पहले भारतीय पीएम के रूप में अपना नाम दर्ज करा दिया है।

अभी जाने हैं कई और मुल्क
पीएम मोदी की यात्रा यहीं समाप्त नहीं हो रही है इस साल भी मोदी की यात्रामोदी की विदेश यात्राएँ और दूर से आती ढोल की आवाज जारी रहने की संभावना है। पीएम इस साल के ही जून में बांग्लादेश, जुलाई में रूस, सितंबर महीने में यूएन, न्यूयार्क और वेनेज्वेला, नवंबर में तुर्की, फिर नवंबर से दिसंबर के बीच मास्को की यात्रा पर जा सकते हैं।

पीएम मोदी की इन ताबड़तोड़ यात्राओं से फिलहाल देश में विकास की कोई तात्कालिक संभावना तो बनती नहीं दिख रही हैं लेकिन मोदी के जाने से कई देशों से रिश्ते अच्छे जरूर बने हैं। अब रही बात मोदी के विदेश नीति पर सफल होने की तो मेरी राय में मोदी का लूक ईस्ट पॉलिसी में तभी पूर्ण सफलता मिलेगी जबकि भारत और पाकिस्तान के आपसी रिश्ते में सुधार आएगा। भारत की तरक्की के लिए पड़ोसी पाकिस्तान का रवैय्या बहुत मायने रखता है क्योंकि विदेशी निवेश के उपर सबसे बड़ा खतरा आतंकवाद का है।

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