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मीडिया और मोदी मृत्युदाता....

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार
जो दे रहे हैं फल पके पकाये हुए, ये पेड़ तुमको मिले हैं लगे लगाये हुए
ज़मीन ओढ़कर सोये हैं सारी दुनिया में, जाने कितने सिकंदर थके-थकाये हुए।
...'राहत इंदोरी' के इस शेर को यहाँ चस्पा करने का हमारा एक ही मकसद है कि लोकतंत्र में सिकदंर बनने की चाहत लिए कोई नेता अवसरवाद की सारी सीमाएँ लांघ सकता है। पेड़ लगाती जनता है, उसे अपने खुन-पसीने से सिंचती जनता है, लेकिन उस पेड़ में जो फल उगते हैं वो जनता की पहुँच से बहुत दुर है। हाँ यहाँ ये तथाकथित नेतागण उन फलों को लगभग पाँच वर्ष अपनी जागीर समझते हैं और चुनाव के दिन आते ही आपको फल बांटने लगते हैं। भारत की भावुक जनता के अंदर भाव हिलकोरे मारने लगती हैं। फिर सिकंदर अपनी मंशा में सफल हो जाता है, हर बार की तरह।
प्रधानमंत्री और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी

आज पूरे भारत में चर्चा का बाज़ार गर्म है। आखिर देश का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा? नरेन्द्र मोदी, राहुल गाँधी या फिर कोई और...। देखते-देखते 2014 का जनवरी महिना समाप्त हो चुका है। यहाँ से तीन महीने बाद चुनाव की रणभेरी बज चुकी होगी। ऐसे में प्रधानमंत्री कोई भी बने लेकिन सारी पार्टीयों को एक बात अच्छी तरह पता है कि सरकार गठबंधन से बन पाएगा। 543 लोकसभा सीटों वाले भारतीय लोकतंत्र में मिशन 272 ही सत्ता पर आसिन करा सकती है। देश की पार्टीयों में रूठने मनाने का दौर जारी है, पुराने सहयोगी पाँच साल कोसने के बाद फिर से बंधन में बंध रहे हैं। शायद सभी पार्टीयों को भारतीय लोकतंत्र कि शुचिता का इल्म है, तभी तो 17 वर्ष पुराने गठबंधन की गांठे एक झटके में खुल जाती हैं और प्रेम तल्खी का रूप अख्तियार कर लेती है।

नरेन्द्र मोदी(नमो) एक ऐसा नाम है, जिसे सुनते ही लोग फ्लेश बैक में 2002 की ओर रवाना हो जाते हैं। दाग वो जो किसी भी विकास रूपी डिटरजेंट से साफ नहीं हो पाता है। आजकल फैसलों का दौर भी चल रहा है देश की अदालत नमो को दोष से बरी कर रही है, लेकिन देश नहीं भूल पा रहा है 2002 का खुनी संघर्ष। इस दंगे की एक खास बात यह है कि दोषी के रूप में पार्टी से ज्यादा दोष एक व्यक्ति पर है, शायद इसकी एक प्रमुख वजह उस समय केन्द्र में अटल विहारी वाजपेयी की नेतृत्व वाली भाजपा सरकार है। नहीं तो इतिहास गवाह है कि ऐसे हिंसा का दोषी हमेशा सरकार मानी जाती है,और सरकार पार्टी की होती है सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं। लेकिन नमो की इच्छा भी यही थी शायद कि वो ही मृत्युदाता के रूप में जाने जाए। जिसका तात्कालिक लाभ 2002 के विधानसभा चुनाव पर पड़ा और गुजरात में भाजपा 127 सीटें जीतने में कामयाब रही।

2002 से लेकर 2012 तक में गुजरात बदला, सोच बदली मृत्युदाता की छवि विकास पुरूष की होने लगी। नमो को पूँजीवाद के जनक के तौर पर देखा जाने लगा साथ में हिटलर जैसी छवि ने मोदी को व्यापारी(कार्पोरेट) घरानों का चहेता बना दिया। फिर वही हुआ जिसका अंदाजा सिर्फ मोदी को था, मीडिया मोदी के पीछे-पीछे चलने लगी। तेजी से अपने स्वरूप में परिवर्तन कर रहे इस लोकतंत्र में युवाओं को एक चेहरा नजर आया वो था नमो। नमो की कहानी जिस तरह से पेश की गई नमो सुपर मेन बन गये। पूरे विश्व में मंदी का दौर था और अर्थशास्त्र के विद्वान के हाथ में देश की बागडोर थी, तभी एक के बाद एक कांग्रेसी जिन्न निकले जिनके उपर भ्रष्ट्राचार के संगीन आरोप थे। इस घटना ने मोदी के जुबान में पंख लगा दिए। भाजपा दुविधा में पड़ गई, जिसने पार्टी को खड़ा किया वो पिछे खड़े होने को मजबूर हो गया। अध्यक्ष राजनाथ सिंह को कहना पड़ा कि "हमे लोकतंत्र में जन भावनाओं का सम्मान करना पड़ता है" लेकिन सवाल ये है कि नमो लहर का जनभावना से संबंध भी है या ये सिर्फ मीडिया द्वारा तैयार किया गया "माया भ्रमजाल" है?

कांग्रेस को दिल्ली की हार ने तोड़कर रख दिया, उसे लगने लगा कि हार सच में करीब है। कांग्रेस कमिटी की बैठक में राहुल गाँधी का भाषण उनके पिता राजीव गाँधी के भाषण (जो मैं यू ट्यूब पर देख रहा था) की याद ताजा कर रही थी। कांग्रेस ने अपनी पुरानी चाल से विपक्षीयों को मात देने की सोची यानि प्रधानमंत्री के नाम की अधिकारिक घोषणा नहीं करके वो पूरी कांग्रेस को प्रधानमंत्री की रेस में रख रही है। भारत के लोकतंत्र की बात की जाये तो उसकी मर्यादा भी इसी में है। लेकिन ये नुकसानदेह भी हो सकता है, लेकिन एक कहावत है ना कि "मरता क्या नहीं करता" अक्सर मीडिया से दूर-दूर रहने वाले राहुल मीडिया के सामने आये। टाइम्स ग्रुप के अर्णव गोस्वामी ने उनका इंटरव्यू किया। राहुल बार-बार फंस जाते थे और वो स्वाभाविक था आखिर इतने दिन में इस तरह का पहला इंटरव्यू जो था।
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल
बांकि राजनीति में नया अध्याय के तौर पर एक नये नेता अरविंद केजरीवाल आएँ हैं इन्हें मीडिया मोदी की राह का सबसे बड़ा रोड़ा बता रही है। अब जनता का मूड और मीडिया का मूड कितना मेल खाता है यह तो लोकसभा चुनाव परिनाम से ही पता चल पाएगा। लेकिन ये सच है "मीडिया और मोदी मृत्युदाता" इस वर्ष में क्या-क्या गुल खिलाते हैं देखना दिलचस्प होगा।

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