सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

बिहार विधानसभा चुनाव में आखिर कौन होगा जनता का राजनेता?

विवेकानंद सिंह
बिहार विधानसभा चुनाव का काउंट डाउन शुरू होने के बेहद करीब है। चूँकि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी 25 जुलाई को पहली बार बिहार आ रहे हैं। अभी तक बिहार में जो भी राजनीतिक नोंक-झोंक और सरगर्मी देखने को मिली है उसके केंद्र बिंदु में मोदी ही नजर आते हैं। चाहे वो लोकसभा आम चुनाव के बाद नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने की घटना हो या फिर उसके बाद लालू-नीतीश का एक साथ आ जाना रहा हो।

ऐसा प्रतीत हो रहा है कि साल 2015 बिहार के राजनीतिक इतिहास में अपनी एक नई पहचान बनाने वाला है। क्योंकि पिछले कुछ महीनों से ही बिहार में राजनीतिक रूपांतरण का एक दौर चल पड़ा है।

जिसने भी फिल्मों की शूटिंग देखी होगी वह जानता होगा कि सेट पर अभिनेताओं के बीच का आपसी रिश्ता और सेट के बाहर का रिश्ता काफी भिन्न होता है। ठीक वही स्थिति अभी बिहार की राजनीति और राजनीतिज्ञों में देखने को मिल रही है। आगामी विधानसभा चुनाव भी किसी फिल्म सी ही लग रही है जिसमें राजनीतिक पार्टियाँ प्रोडक्शन हाउस बन गई हैं और वे अलग-अलग सुपरस्टार साइन किए जा रहे हैं। इनमें से कई “बिग स्टोरी टेलर” तो कई “टू लाइन स्टोरी टेलर” हैं। वर्तमान समय में सारा खेल बस कह देने का ही है। पार्टियों को लगता है कि इन आगामी दो-तीन महीनों में जो जितनी अधिक मात्रा में कुछ कह पाएगा जनता उसी की मुरीद हो जाएगी।

ऐसी स्थिति में अगर प्रधानमंत्री मोदी के अब तक की कार्यशैली को गौर से देखें तो वो भी ‘टाइम मैन’ की तरह नजर आते हैं। वह समय के साथ राजनीतिक सामंजस्य के महत्व को अच्छी तरह से डील करते रहे हैं ताकि वो विपक्ष को मात दे सकें। उनके अंदर एक विविध स्वाभाव का ऐसा आदमी बैठा है जो नरेंद्र मोदी को डाइवर्स, स्मार्ट और सटीक दांव लगाने वाला नेता बनाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कब बोलने लगेंगे और कब तक चुप रहेंगे? ये सबकुछ पूर्व निर्धारित सा मालूम पड़ता है। लेकिन सवाल यह है कि उनका ये दांव बिहार के आगामी चुनाव में चलेगा भी या नहीं?

हो सकता है बिहार के लिए आने वाले कुछ दिन “क्रिसमस टाइम” जैसे हों, जहां लगे कि गिफ्टों की भरमार सी हो गई है। 25 जुलाई को आईआईटी के उद्घाट्न के मौके पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत करेंगे। वह पल सिनेमा के उस सीन जैसा हो सकता है जब दो बेहतरीन कलाकार अपने संवाद के जरिए लोगों की तालियाँ बटोरने की कोशिश करते हैं। अब ये मुलाकात कैसी रहेगी ये तो 25 जुलाई को ही पता चलेगा। 

एक प्रश्न यह भी है कि आगामी विधानसभा चुनाव के निर्माता और निर्देशक कौन होंगे? यह तय होना अब तक बाकी है। ऐसे तो लोकतंत्र में अमूमन निर्माण और निर्देशन की भूमिका जनता को निभानी चाहिए लेकिन मामला थोड़ा अलग सा लग रहा है। बिहार के लोगों से, अपने घरवालों और अपने दोस्तों से बात करने पर पता चला कि वो राजनीतिक रूप से कनफ्यूज हैं। जब मैंने जानना चाहा कि आखिर इस कनफ्यूजन की वजह क्या है? तो पता चला कि वे लोग अभिनेता और बिलेन का फर्क नहीं कर पा रहे हैं। क्या इस कनफ्यूजन की वजह चुनाव प्रचार की तामझाम और हाईटेकनेस तो नहीं है?

बड़े-बड़े होटलों के सेफ जैसे कई वेराइटी की सब्जियाँ झट से बना डालते हैं उसी तरह राजनीति से जुड़े मसलों को बिहारी यूँ चुटकियों में निवटा देते हैं। परंतु इस बार लग रहा है कि ये बिहारी जनमानस कहीं चुनाव परिणाम को “कढ़ाई पनीर” बनाने की जगह “मिक्स वेज” ना बना दें? अगर ऐसा हुआ तो देखना दिलचस्प होगा कि राजनीति का “मिक्स वेजीटेवल” कितना टेस्टी हो पाता है?

बाकी तो आपलोग जानते ही हैं कि बिहार का चोखा कितना मशहूर है? तो आप भी तैयार रहिए बिहार की राजनीति का निर्माण और निर्देशन करने के लिए, ऐसा न हो कि आप सोचते ही रह जांए और आपकी फिल्म कोई और ही बना दे। एक अन्य बात को ध्यान में रखना भी जरूरी है कि एक्टर के संवाद से ज्यादा उसका एक्ट मायने रखता है, क्योंकि संवाद किसी और का भी लिखा हो सकता है लेकिन एक्ट उसका खुद का काम होता है। उसकी खुद की मेहनत होती है। …तो बिहार की जनता तैयार रहिए ‘एक्ट को सेलेक्ट’ करने के लिए और हम भी आते रहेंगे आपके बीच राजनीति के कई दिलचस्प किस्सों के साथ। तब तक के लिए नमस्कार!

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

जीवन की सार्थकता

लोग कहते हैं जीवन नश्वर है। बहुत से महान व्यक्तियों और संतों ने भी इस बात की सत्यता भी प्रमाणित की है। वे बड़े लोग थे उन्हें झूठलाया नहीं जा सकता- लेकिन मेरी समझ में जीवन नश्वर नहीं है। अगर नश्वर होता तो आज विश्व में मानव का आस्तित्व ही नहीं रहता। नश्वर शब्द का तात्पर्य उस वस्तु से है जिसका आस्तित्व ना रहें। किंतु मानव का आस्तित्व था, है, और रहेगा। व्यक्तिगत मृत्यु मानव का विनाश नहीं है। वह सिर्फ निरर्थक पत्तों का गिरना मात्र है। जिससे मानव रूपी वृक्ष की सुन्दरता विकृत ना हो जाय। व्यक्तिगत क्षति मेरी क्षति है। पर मानवता की नहीं...... विवेकानन्द आई आई एम सी

बिहार चुनाव को लेकर क्या है जनता परिवार की राजनीति?

विवेकानंद सिंह जनता परिवार को लेकर सबके दिमाग  में अभी बस एक ही बात आ रही होगी कि इतना हो-हल्ला और कई मीटिंग्स के दौर के बाद जब सबने एक होने का फैसला कर ही लिया तो बिहार विधानसभा चुनाव से पहले यह विलय क्यों नहीं? जब मोदी की लहर के कारण धुर विरोधी हो चुके दो भाई गले मिलने को तैयार हो ही गए तो अब आखिर क्या समस्या हो गई? क्या लालू-नीतीश के रिश्तों में फिर से दरार आ गई? क्या पप्पू और मांझी का इसमें कोई फैक्टर तो नहीं है? लेकिन सवालों से इतर हकीकत यही है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में राजद-जदयू के विलय से बेहतर विकल्प उनके लिए गठबंधन ही है। राजद के एक नेता से मेरी बात हुई तो उनका कहना था कि उनके लिए सीटों की संख्या से बड़ा मसला 16 वीं बिहार विधान सभा चुनाव में बीजेपी को सत्ता तक पहुँचने से रोकना है। बीजेपी के नेता ने कहा कि इनकी आपसी लड़ाई के बीच हम 175 का आंकड़ा छूने में कामयाब होकर रहेंगे। खैर हार-जीत का पता तो चुनाव के बाद ही चलेगा लेकिन जनता परिवार में बिहार विधानसभा चुनाव से पहले इस हलचल पर मशहूर नारा याद आ रहा है “अभी तो ये अंगड़ाई है आगे और लड़ाई है”। देखना दिलचस्प होगा क...

यहां सरकारी स्कूलों के 'शिक्षक' बने हैं 'मैनेजर'

विवेकानंद सिंह सरकारी स्कूलों में मिलनेवाली शिक्षा की गुणवत्ता की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। खास तौर से बिहार के सरकारी स्कूलों में काम करनेवाले शिक्षक आजकल गजब के मैनेजर बन गये हैं। हो सकता है आपको मेरी बातें थोड़ी अजीब लगे, लेकिन यह एक सच्चाई है। पढ़ाने के अलावा अपनी नौकरी बचाने के लिए व कम सैलरी को बेहतर बनाने के लिए उन्हें कई तरह से खुद को और छात्रों के अटेंडेंस को मैनेज करना पड़ता है। उन्हें हर दिन बच्चों के बिना स्कूल आये भी, उनका अटेंडेंस बनना पड़ता है। इसमें हेडमास्टर साहब (प्रधानाध्यापक) से लेकर शिक्षक भी एक-दूसरे की मदद करते नजर आते हैं। हालांकि, वे भ्रष्ट नहीं, बल्कि बस मैनेज कर रहे होते हैं, क्योंकि उनके ऊपर बैठे प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी, जिला शिक्षा पदाधिकारी का काम भी सिर्फ अपनी सैलरी से तो नहीं चल पाता है। दरअसल, वे लोग भी मैनेज कर रहे होते हैं। क्योंकि, सबसे खास बात यह है कि बच्चों के पिता खुद ही मैनेज कर रहे होते हैं। वे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की चाह में अपने बच्चे को ट्यूशन देते हैं, प्राइवेट टाइप स्कूल में पढ़ने भेजते हैं, लेकिन सरकारी सिंड्रोम से ग्रस्त हो...