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डिग्री की जगह टैलेंट पर भरोसा कर हुए सफल

कई सफल स्टार्टअप्स को लीड कर रहे हैं कॉलेज ड्रॉपआउट

-विवेकानंद सिंह
हम अच्छी तरह से जानते हैं कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता है. जीवन में हम सभी सफल होने के लिए कई तरह डिग्रियां हासिल करने में लगे रहते हैं, लेकिन जब डिफरेंट फिल्ड में सफल लोगों की कहानियों से हम गुजरते हैं, तो पाते हैं कि उनमें से अच्छी-खासी संख्या में कॉलेज ड्रॉपआउट या कॉलेज तक नहीं पहुंच पानेवाले छात्र शामिल हैं. आखिर सफलता और कॉलेज छोड़ने का यह क्या कनेक्शन है? साथ ही इन ड्रॉप आउट्स की कहानी उन लोगों के लिए भी प्रेरणादायी, जो अच्छे कॉलेज में दाखिला न पाने, परीक्षा में अच्छे अंक नहीं ला पाने की वजह से दुखी हैं. पढ़िए रिपोर्ट.
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आप रोज नये-नये स्टार्टअप्स के सफल होने की कहानियां पढ़ते होंगे. अगर आप उन पर ध्यान देंगे तो पायेंगे कि सफल होनेवाले कई ऐसे युवा हैं, जिन्होंने कॉलेज की पढ़ाई बीच में छोड़ कर अपना स्टार्टअप शुरू करने का फैसला लिया. कई लोग तो ऐसे भी हैं, जिन्होंने कॉलेज का मुंह तक नहीं देखा. आगे चल कर वे अपने फैसले में न सिर्फ सफल हुए, बल्कि दुनिया के लिए एक उदाहरण बन कर उभरे. आश्चर्य की बात है कि आज वे स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर चुके युवाओं से मीलों आगे निकल चुके हैं. इस लिस्ट में ओपरा विनफ्रे, बिल गेट्स, स्टीव जॉब्स जैसी कई विश्व प्रसिद्ध हस्तियां शामिल हैं. हम आपको कुछ ऐसे ही सफल भारतीय युवाओं के बारे बताने जा रहे हैं, जिन्होंने अपने टैलेंट पर भरोसा कर कॉलेज की पढ़ाई बीच में छोड़ दी. उन्होंने साबित किया है कि कुछ भी बड़ा करने के लिए डिग्री नहीं, जज्बे की जरूरत होती है. अब आपके मन में यह सवाल भी उठ रहा होगा कि क्या कॉलेज छोड़ देना ही सफलता का पैमाना है? इन युवाओं की कहानी में आपको इस सवाल का जवाब भी मिल जायेगा.

वरुण शूर, कायाको

पंजाब के जालंधर शहर के रहनेवाले वरुण शूर ने 17 वर्ष की उम्र में स्कूल को छोड़ने का फैसला लिया था. तब वे इंटमीडिएट फर्स्ट इयर के छात्र थे. वरुण शूर ने वर्ष 2001 में कायाको नाम से एक कंपनी शुरू की थी. यह कंपनी कस्टमर सपोर्ट सॉफ्टवेयर प्रोवाइड कराती है. आज वरुण की कंपनी काफी प्रॉफिट में हैं. कायाको अब तक एक लाख डॉलर ज्यादा के सॉफ्टवेयर डॉनेट कर चुकी है.

कैलाश काटकर, क्विक हील टेक्नोलॉजीज

महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव में पले-बढ़े कैलाश काटकर एक ऐसे शख्स हैं, जो सीनियर सेकेंड्री भी मुश्किल से पास कर पाये थे. परिवार की स्थिति खराब होने के कारण उन्होंने स्कूल छोड़ दिया. इसके बाद कैलाश रेडियो ठीक करनेवाली दुकान पर काम करने लगे. नौकरी से उन्होंने कुछ पैसे बचा कर कंप्यूटर हार्डवेयर का काम शुरू किया. फिर कैलाश ने क्विक हील नाम से एक एंटीवायरस तैयार किया. कुछ दिनों में ही इनका एप्लीकेशन काफी सक्सेसफुल हो गया. फिर इन्होंने क्विक हील टेक्नोलॉजीज कंपनी बनायी. आज इनकी कंपनी की कीमत 200 करोड़ रुपये से भी ज्यादा है.

रितेश अग्रवाल, ओयो रूम्स

रितेश अग्रवाल उस सफल युवा का नाम है, जिसे कुछ बड़ा करने का जूनून था. रितेश ने साबित किया कि सफलता के लिए एमबीए की डिग्री या कॉरपोरेट जॉब्स के अनुभव से ज्यादा जरूरी है, जीत हासिल करने का जज्बा. ओडिशा के छोटे से शहर कटक के रहनेवाले रितेश ने 18 वर्ष के बाद ही पढ़ाई को छोड़ दिल्ली आने का फैसला किया. इसी बीच एक फैलोशिप में उन्हें कुछ पैसे मिले, जिसकी मदद से रितेश अग्रवाल महीनों अलग-अलग शहरों में घूमते और होटल में रुकते, ताकि वहां की तमाम चीजों के बारे में जान सकें.फिर रितेश ने एक वेबसाइट की शुरुआत की, जहां वे सस्‍ते और किफायती होटल्‍स के बारे में जानकारी देते हैं. आज आप उसे ओयो रूम्स के नाम से जानते हैं. अगर रितेश डिग्रियां हासिल करने के इंतजार में रहते तो आज वे 100 मिलियन डॉलर की उनकी कंपनी उनके पास न होती.
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ये हो सकती हैं इनके सफल होने की वजह
  • कॉलेज की शिक्षा पर जब आप नजर दौड़ायेंगे, तो पायेंगे कि वहां व्यावहारिक प्रशिक्षण की जगह सैद्धांतिक शिक्षा पर ज्यादा फोकस किया जाता है. यहां ईमानदारी से कहने की जरूरत है कि एक स्तर की पढ़ाई के बाद सैद्धांतिक शिक्षा असल जिंदगी को बदलने में उतनी कारगर नहीं हो पाती है. यहां इन युवाओं ने अपने टैलेंट पर भरोसा किया और पैशनेट हो कर ईमानदारी से अपना काम किया. आज इनकी सफलता को सभी सलाम करते हैं.
  • दूसरी बात यह हो सकती है कि कॉलेज ड्रॉपआउट्स अपने लक्ष्य को हासिल करने की शुरुआत उनसे पहले करते हैं, जिन्हें डिग्री या डिप्लोमा हासिल कर लेने का इंतजार होता है. ऐसे में स्वाभाविक है ड्रॉपआउट्स को अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए अधिक समय मिल जाता है.
  • एक कारण यह भी हो सकता है कि एजुकेशन के लिए वे जितना स्टूडेंट्स लोन लेते, उनका इस्तेमाल वे बिजनेस इन्वेस्टमेंट के लिए कर सकते हैं.
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कुणाल शाह, फ्रीचार्ज

कुणाल शाह ने मुंबई के विल्सन कॉलेज से दर्शनशास्त्र में स्नातक की पढ़ाई की. इसके बाद उन्होंने नर्सी मोंजी इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज, मुंबई से एमबीए की पढ़ाई शुरू की, लेकिन उसे बीच में ही छोड़ दिया. फिर ऑनलाइन रीचार्ज के बिजनेस में संभावनाओं को देखते हुए शाह ने वर्ष 2010 में उन्होंने फ्रीचार्ज नाम से एक कंपनी बनायी. वर्ष 2015 में फ्रीचार्ज को स्नैपडील ने 400 मिलियन डॉलर में खरीद लिया. अब कुणाल फ्रीचार्ज में सीइओ हैं.

अजहर इकबाल, न्यूज इन शॉर्ट

इन शॉर्ट एक न्यूज एप है, जो 60 से भी कम शब्दों में आपको खबर देता है. यह एप उन लोगों के लिए काफी काम की है, जिनके पास खबर को डिटेल में पढ़ने का समय नहीं होता है. इसकी शुरुआत अजहर इकबाल और उनके दो दोस्तों ने मिल कर की, जो आइआइटी के फोर्थ इयर ड्रॉपआउट हैं. इनशॉर्ट की शुरुआत एक फेसबुक पेज से हुई, आज इन-शॉर्ट एक सफल स्टार्टअप्स के रूप में गिना जाता है. आज इनके वेंचर में बड़ी-बड़ी कंपनियों ने इन्वेस्टमेंट किया हुआ है. अजहर मूलतः बिहार के किशनगंज के रहनेवाले हैं.
फोटो साभार : गूगल इमेज

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