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संदेश

दफ्तर के अंदर बैठे पत्रकार की यात्रा

छोड़ रहा हूँ इकबार फिर से तुझे ऐ दिलवाले शहर... लेकिन मेरे अनुभव की किताब का चौराहा तो तूं ही होगा। मुझे लगता है कि मैं बिल्कुल देशी मॉडल का एक शहरी आदमी हूँ। अक्सर जिस किराये के मकान में रहता हूँ उसे अपना ही घर समझने की भूल कर लेता हूँ, जिस कंपनी में काम करता हूँ वह कंपनी मुझे अपनी ही लगने लगती है। लेकिन यकायक जब ये सबकुछ छूटने को होता है तो मैं बार-बार फ्लेशबैक में चला जाता हूँ और यादों की फिल्म आभासी परदे पर मेरे सामने से किसी परछाई की तरह गुजरने लगती है। कुछ ऐसा ही वक्त था जब मैं आई-नेक्स्ट समाचारपत्र की नौकरी (कानपुर) को छोड़ रहा था लेकिन तब मुझे इस बात की खुशी थी कि मैं अपने दोस्तों के बीच दिल्ली लौट रहा हूँ। फिर यहाँ दिल्ली आकर एक नई वेबसाइट से जुड़ना और चार लोगों की लॉचिंग टीम का हिस्सा बनना अपने-आप में कमाल का अनुभव था। हमलोगों ने कई ईमानदार कोशिशें की लेकिन तब हमारी स्टोरी को 100 लोग भी पढ़ लेते थे तो हमारे अंदर एक सुकून का भाव आ जाता था। वह दिन शायद ज्यादा खुशी का था जब हमने देखा कि किसानों के मुद्दे पर लिखे गए एक आलेख को अबतक तीन हजार से ज्यादा लोग पढ़ चुक...

प्रकृति के साथ कौन करेगा संवाद?

यह जीवन किस कदर क्रूर हो सकता है इसकी बानगी हम नेपाल त्रासदी में देख ही रहे हैं। वर्षों की मेहनत के बाद बना निर्माण कैसे देखते ही देखते ताश के पत्तों की तरह बिखर गया? साथ में बिखर गई हजारों साँसें, संबंध और संवेदनाएँ! जब प्रकृति अपना संतुलन खोती है तब बात-बात में प्रकृति को नीचा दिखाने वाले मानव लाचार और बेबस नज़र आने लगते हैं। आज कुछ ऐसी ही बेबसी मन ही मन मैं भी महसूस कर रहा हूँ, दिल में अजीब सी बेचैनी और अकुलाहट हो रही है। नेपाल में मरने वालों में मेरा अपना तो कोई नहीं है जिसे मैं स्वयं जानता हूँ लेकिन मानवता के नाते लगता है कि कई दिनों से मैं कितना कुछ खोता जा रहा हूँ? मुनरिका के जिस मेस में मैंं खाता हूँ, रात में जब वहाँ खाने पहुँचा तो खाते समय पंडित जी बोले लगता है आज शाम आपने बाहर में नाश्ता कर लिया है। मैंने जवाब दिया नहीं तो, वो फिर बोले... तो आज तीन ही रोटी क्यों? अन्य दिन तो छह रोटियाँ खा लेते थे। मैंने कहा बस भूख नहीं है पंडित जी। खाने के बाद जब से कमरे में आया हूँ तब से न कुछ पढ़ने की इच्छा हो रही थी और न ही नींद आ रही थी। बस लेपटॉप में फेसबुक का एक विंडो ...

अरे यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिन्दगी...!

दोस्त जब एकजुट होते हैं तो मानों धरती पर आकाशगंगा उतर आती है। ऐसा लगता है जैसे वीरान वादियों के बोझिल सन्नाटे में रंग-बिरंगे तारे जगमगा उठे हों। मन कब बच्चा बन जाता है पता ही नहीं चलता। उस समय बस सबसे जी भर के गले लग जाने को दिल चाहता है। न कोई गिला-शिकवा और न ही कोई शिकायत! कुछ तो बात है इन फिजाओं में कल यानी कि 28 मार्च की शाम जेएनयू के पूर्वांचल का कुछ ऐसा ही नज़ारा था। हमारे अनन्य मित्र "अभिषेक कुमार चंचल" और उनके हम जैसे स्नेही स्वजनों के सहयोग से लिट्टी-चोखा के  बहाने आईआईएमसी के दोस्तों का मिलन हुआ। वो बीते लम्हें फ़्लैशबेक की तरह हमारी नज़रों के सामने थे। जब सोचता हूँ तो गहराईयों में उतर जाता हूँ शाम तो ऐसे गुजरी जैसे सामने से कोई ग़ज़ल गुजर रही हो। सच कहता हूँ दिल करता रहा कि इस शाम को बस यूँ ही मुठ्ठी में थाम कर रख लूँ, लेकिन दिल में बसी यादों और कुछ तस्वीरों के सिवाय हम उस पल को बीत जाने से रोक न सके।  नौकरी और कुछ निजी बाध्यताओं की वजह से सारे मित्र तो नहीं आ सके लेकिन जो आये उनसे मिलकर ऐसा लगा जैसे चैत के महीने में बहते-बहते खुद बसंत चला आया है।...

नहीं रुकेगी ये कलम!

जब मैं उच्च विद्यालय में पढ़ता था तब हम अपने सहपाठी को चिढ़ाने के लिए एक-दूसरे के पिताजी के नाम पर टिप्पणी करते थे, और इस बात पर हमारे बीच मारा-मारी तक हो जाती थी। कभी-कभी बात इतनी बढ़ती थी कि प्रधानाध्यापक से होते हुए बात घर तक पहुँच जाती थी। फिर पिताजी मुझे जमकर डांटते थे। मैं कहता कि पहले तो उसी ने आपका नाम बोला था, वो मेरी एक न सुनते थे। धीरे-धीरे जब माध्यमिक की कक्षा तक पहुंचे तब एहसास होने लगा कि ये क्या हद चिरकुटई करते थे हमलोग! उसी समय पहली बार किसी सभा में एहसास दिलाया गया कि हम हिन्दू हैं। फिर मुझे भी ये लगने लगा कि मुस्लिम कितने निर्दयी होते हैं? गाय काट कर खा जाते हैं। उसी दौरान एक दिन मैंने एक हिन्दू को बकरा काटते देखा, बकरा में-में कर तड़प कर मर गया। फिर मुझे लगा ये हिन्दू भी कितने निर्दयी होते हैं? हिन्दू भी निर्दयी, मुसलमान भी निर्दयी तो दयावान क्या सिर्फ मैं ही हूँ? उत्तर जानने कि कोशिश की तो पता चला कि ये निर्दयी नाम के प्राणी हर धर्म में होते हैं जिनका धर्म से कोई वास्ता नहीं होता है। उन्हें बस हिंसा का बहाना चाहिए होता है। मेरा गाँव हरचंडी उस लौंगाय स...

फैसलों का कप्तानः महेंद्र सिंह धोनी

भारतीय क्रिकेट इतिहास में 30 दिसंबर 2014 एक ऐसे कप्तान के लिए याद किया जाएगा जो हमेशा अपने फैसलों के कारण मशहूर हुआ। खेल का मैदान हो चाहे युद्ध का मैदान दोनों जगहों पर जीत या, हार में योद्धा के द्वारा लिए गए निर्णय अहम भूमिका निभाते हैं। जी हां भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने एक बार फिर एक सही फैसला लिया है। टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लेने का उनका फैसला ठीक वैसा ही है जैसा कि 2007 के 20-20 विश्व कप के फाइनल में उन्होंने मिसबाह उल हक के सामने आखिरी ओवर की गेंदबाजी का जिम्मा जोगेन्दर शर्मा को थमा दिया था। उस समय भी क्रिकेट प्रेमियों को आश्चर्य हुआ था और आज भी हो रहा है, लेकिन भारत को सफलता तब भी मिली थी और अब भी मिलेगी। धोनी के पूरे टेस्ट क्रिकेट करियर से अगर उनकी कप्तानी में विदेशों में खेले गए मैचों का आंकड़ा हटा दिया जाए तो उनका रिकार्ड एक कप्तान के तौर पर असाधारण हो जाती है, वहीं विदेशों में खेले गए मैचों में उनका ये आंकड़ा औसत से भी खराब नजर आता है। यहां पर हार-जीत में कप्तानी के साथ-साथ टीम भी उतनी ही जिम्मेदार होती है। यानी कि हम कह सकते हैं कि धोनी की सफ...

जब मैं भी बन गया था ‪बाबा‬ !

बाबा रामपाल के चक्कर में कुछ देर के लिए ही सही, गली-मोहल्ले और तमाम शहरों में जमे पड़े स्वयंभू बाबाओं के पाखण्ड से पर्दा हटाने की कोशिश हो रही है। मैंने सोचा चलो इसी बहाने मैं भी अपने कुछ राज शेयर करूँ। मेरे पुराने दोस्त जो मुझे इंटरमीडिएट के समय से जानते हैं वो मुझे "बाबा" कहकर भी बुलाते हैं। इसके पीछे की वजह ये है कि तीन दिन तक एक आश्रम में मैं भी बाबा की तरह ही रहा था। इसके पीछे की घटना थोड़ी लम्बी है, जो लोग बिहार के होंगे वो "संतमत" को जानते होंगे। मेरे माता-पिता इस मत से दीक्षित हैं। इस मत के प्रचारक "महर्षि मेंही दास" रहे थे। भागलपुर के रहने वाले इस मत से और अच्छी तरह वाकिफ होंगे। कुप्पघाट में इनका आश्रम है, आये दिन यह आश्रम भी भिन्न-भिन्न कारणों से विवादों में रहा है। वैसे यह सच है कि सत्संग में अच्छी-अच्छी बातें ही बताई जाती हैं, लेकिन आप जिनकी बातें मानकर, "राह पकड़कर एक चलाचल पा जाएगा मोक्ष-शाला" के लिए निकल पड़ते हैं उस गुरु को जांचना-परखना भी जरुरी होता है। अब मुद्दे पर आता हूँ हुआ यूँ कि भागलपुर से सटे सबौर में "स्वाम...

सांसद जी हमारा गांव भी ग्लोबल होना चाहता है

आज गाँव-गाँव सुनकर अपने गाँव की बहुत याद आई। मन कर रहा था कि बिहार के सारे सांसदों को मेल करूँ कि अरे कोई सांसद मेरे गाँव "हरचंडी" को भी गोद ले लीजिये भाई। परन्तु रुक गया, चूँकि बिहार में मेरे अपने गृह क्षेत्रों का भाग्य देखिये जब तक कांग्रेस की सरकार रही भागलपुर में बीजेपी के शाहनवाज़ हुसैन और बांका से गिरधारी यादव और क्रमश: निर्दलीय के तौर पर दिग्विजय बाबू (दादा) और उनकी पत्नी पुतुल कुमा री सांसद रहीं। गिरधारी जी अपनी बांसुरी बजाने में पांच साल रहे। दादा जब तक थे जैसे भी हो बांका थोड़ा ही सही पर विकास कर रहा था। जब से दादा का निधन हुआ और पुतुल कुमारी सांसद बनी तब से धीरे-धीरे उनके साथ रहने वाले चमचों ने दादा के नाम को भी धूमिल किया। नतीजा सामने रहा बांका से मोदी लहर में भी राजद के जयप्रकाश यादव की जीत हुई। कुछ वर्षों से भागलपुर की भाजपा में उठापटक जारी थी, शाहनवाज़ हुसैन को लेकर उनके ही बीच ये धारणा थी कि जब तक ये भागलपुर में रहेंगे यहाँ का नेता उभर नहीं पायेगा। प्रयोगशाला तैयार हुई और प्रयोग सफल रहा और भागलपुर से शाहनवाज हुसैन हार भी गए। अब बताईये हमारे...