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सत्ता का गुणसूत्र

विवेकानंद सिंह क्रोमोजोम यानी गुणसूत्र से तो आपलोग वाकिफ ही होंगे। इसमें जरा-सा एब्रेशन (दोष) आ जाये, तो अपंगता, मेंटल रेटार्डनेस, नपुंसकता जैसी समस्याएं आम बात हो जाती हैं। सत्ता के मामले में भी ऐसी समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है। बहुमत से एक सीट भी इधर-उधर हों, तो पूरा का पूरा खेल बिगड़ जाता है। अब उत्तर प्रदेश में होनेवाले विधानसभा चुनाव को ही लीजिए। वहां की 403 विधानसभा और एक एंग्लो-इन्डियन सदस्य सहित 404 विधानसभा सदस्यों वाली विधानसभा में विजयी आंकड़े यानी 203 सीटें हासिल करने का हर पार्टी का अपना समीकरण है। अभी तक जो चुनावी रुझान बन रहे हैं उस हिसाब से सत्ता की रेस में तीन प्रमुख पार्टियां शामिल हैं। बाकी दलों में कांग्रेस राहुल गांधी को नेतागिरी की ट्रेनिंग देने के लिए और बचे-खुचे बस अपनी दाल-रोटी की जुगाड़ के लिए मैदान में डटे हैं। हालांकि, मामला इतना भी आसान नहीं है, जितना कि सर्वे वाले बता रहे हैं। फिर भी राज्य में धीरे-धीरे हालात कुछ ऐसे बनाये जाने की कोशिश हो रही है कि बहुसंख्यक हिन्दू अस्मिता जग जाए और वे जय श्री राम का नारा लगानेवालों के साथ हो लें। क्योंकि,...

भूखे गरीब की ये ही दुआ है

विवेकानंद सिंह वर्ष 1969 में एक चर्चित हिंदी फिल्म आयी थी, जिसका नाम था ‘एक फूल दो माली’. इस फिल्म का एक गाना- भूखे, गरीब ये ही दुआ है, औलाद वालो फूलो फलो. पैसे दो पैसे से तुम्हारा कुछ न घटेगा, ओ दौलत वालो. काफी पॉपुलर हुआ। मैंने पहली बार इस गाने को अपने गांव से सटे बाजार जगदीशपुर में एक वृद्ध भिखारी को गाते सुना था। बाद में फिल्म भी देखी। आज इस गाने की चर्चा इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि आज भी हमारे देश में भूखे और गरीब बस दुआ ही कर पाने के योग्य हैं। उनके हिस्से का सच आज भी ज्यों-का-त्यों है। हम भले ही अपने देश के अरबपतियों की सूची देख कर गौरव से भर जाते हैं। लेकिन, जब कोई वैश्विक रिपोर्ट यह बताती है कि कुपोषण से जूझ रहे दुनिया के 118 देशों में हमारे देश का स्थान 97वां है, तो हमारे तरक्की की सारी पोल खुल जाती है। कुछ लोग, तो फिर भी खुश होंगे कि हम पाकिस्तान से आगे हैं। उन्हें खुलेआम चुनौती, तो दे ही सकते हैं कि भूख से लड़ कर दिखाओ, कुपोषण से लड़ कर दिखाओ, आदि-आदि। दरअसल, पिछले 11 अक्तूबर को अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (IFPRI) द्वारा वैश्विक भुखमरी सूचकांक यानी ग...

पदकों से भारत की झोली भरने की तैयारी

भारत को रियो ओलिंपिक से पदकों की काफी उम्मीदें हैं, सिर्फ पदक ही नहीं कई खिलाड़ियों ने अपने प्रदर्शन से यह उम्मीद जगायी है कि सोने के तमगे भी हमारे हिस्से आ सकते हैं. 5 अगस्त से 21 अगस्त तक चलनेवाले इस ओलिंपिक महाकुंभ में शामिल होने जा रहे 121 भारतीय खिलाड़ियों पर पूरे देश की निगाहें टिकी हैं. विवेकानंद सिंह की रिपोर्ट. इस ओलिंपिक में भारत के कुछ ऐसे खास चेहरे भी हैं, जिन पर पूरी दुनिया की नजर है. अब तक के इनके प्रदर्शन से भारत की उम्मीदें बंधी हैं. पदकों से भारत की झोली भर कर भारत के मिशन ओलिंपिक को पूरा करने का पूरा दारोमदार इन खिलाड़ियों के कंधे पर है. ब्राजील के शहर रियो डि जेनेरो में ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में दो सौ देशों से करीब दस हजार से ज्यादा एथलीट हिस्सा ले रहे हैं. लंदन ओलंपिक 2012 में जहां भारत की ओर से 83 एथलीट ने हिस्सा लिया था, वहीं इस बार 121 खिलाड़ी भाग ले रहे हैं. इनमें एथलेटिक्स में 38, हॉकी में 32, निशानेबाजी में 12, कुश्ती में 7, बैडमिंटन में 7, तीरंदाजी, टेबल टेनिस और टेनिस में 4-4 खिलाड़ी अपनी चुनौती रखेंगे. कुश्ती के दबंग हैं योगेश्वर 1. योगेश्वर दत्त...

उत्तर प्रदेश की राजनीति में नीतीश कुमार इफेक्ट !

नीतीश कुमार उत्तर प्रदेश की राजनीति में आखिर इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहे हैं? जिस प्रदेश में जदयू का न तो कोई संगठन रहा है और न ही राजनीतिक सक्रियता। ऐसे में बिहार के मुख्यमंत्री की बड़ी-बड़ी रैलियां उनकी भावी राजनीति के लिए कहीं आत्मघाती कदम, तो नहीं साबित होंगी? क्या नीतीश कुमार सच में प्रधानमंत्री बनने के लिए अपनी ब्रांडिंग में जुटे हैं? इन सवालों से इतर यह सवाल सभी के दिमाग में है कि नीतीश कुमार के यूपी आने का सबसे ज्यादा नुकसान किस पार्टी को होगा? नीतीश कुमार की सभाओं में आनेवाली भीड़ उनका हौसला बढ़ा ही रहा होगा. भले ही जदयू 2017 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कोई सीट न जीत पाये, लेकिन उसकी उपस्थिति का असर जरूर होनेवाला है. दरअसल, जदयू का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाने के बाद से नीतीश कुमार की राजनीति का रुख राष्ट्रीय हो गया है. वे केंद्र सरकार की नीतियों को आड़े हाथों ले रहे हैं. उन्हें पता है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है. शराबबंदी के नारे के साथ, जहां नीतीश कुमार की नजर महिला वोटों पर है, वहीं उत्तर प्रदेश में उनके आने से भी कुर्मी, ...

क्या संभव है जल के बिना जीवन की कल्पना?

May 7, 2015 फोटो साभार- अभिषेक कुमार चंचल मौजूदा समय में प्रकृति बात-बात  पर हमें डराती हुई मालूम पड़ती है। चाहे वह केदारनाथ की त्रासदी हो, बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि हो, नेपाल में आया भयंकर भूकंप हो या फिर उत्तर पूर्व बिहार में आए भयंकर तूफान हो, आपदा की ये सारी निशानियाँ चीख-चीख कर कहती है कि जीवन सही मायनों में दिन-प्रतिदिन और कठिन होती जा रही है। भौतिकतावादी होने के दौरान प्रकृति के साथ हुए दोहन ने “जलवायु परिवर्तन” रूपी विकट समस्या को हमारे सामने ला खड़ा किया है। कभी-कभी बस मन में एक ही सवाल उठता है कि क्या जल के बिना जीवन की कल्पना की जा सकती है? एक तरफ भारत सरकार की गंगा-सफाई योजना ने नदियों के प्रदूषण की तरफ तो देश का ध्यान आकृष्ठ किया है लेकिन देश में पानी का प्रदूषण सिर्फ नदियों तक ही सीमित नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत में लगभग 9.7 करोड़ लोगों को ही पीने का साफ पानी मिल पाता है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र की उस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दुनिया की जरूरतें पूरी करने के लिए पानी का स्त्रोत पर्याप्त है, लेकिन उसके सही प्रबंधन की जरूरत ह...

भारतीय लोकतंत्र में न्याय के मायने

विवेकानंद सिंह 11 मई को दक्षिण भारत  के दो अलग-अलग कोर्ट से दो फैसले आए, एक में तमीलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता को कर्नाटक हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामले में मिली सजा से उनको बरी कर दिया। वहीं दूसरी ओर खातों में हेराफेरी कर करोड़ों रुपए के घोटाले में दोषी ठहराए गए बी. रामालिंगा राजू तथा 9 अन्य को अदालत ने जमानत दे दी। आज से चार दिन पहले 8 मई शुक्रवार को कुछ ऐसा ही फैसला मुंबई की अदालत से आया था जब बॉलिवुड अभिनेता सलमान खान को हिट एंड रन केस में 13 साल बाद सजा मिलने के दो दिन बाद बिना जेल गए ही जमानत मिल गई। यह तो भारत के न्याय का एक चेहरा मात्र है, इसके दूसरे चेहरे में वो गरीब, पीड़ित और बेबस इंसान शामिल हैं जो न्याय की चौखट पर भीख मांगते-मांगते फना तक हो जाते हैं। एक ऐसी ही दास्तां है दिल्ली विश्वविद्यालय के रामलाल आनंद कॉलेज में अंग्रेजी के लेक्चरर, डॉ. जी. एन. साईबाबा की जिन्हें 9 मई 2014 को महाराष्ट्र पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया था। 90 प्रतिशत तक निःशक्त व्हील चेयर पर चलने वाले इस प्रोफेसर को पुलिस की डायरी में आतंकी बताया गया है। क्या कानून और...

यह सरकार क्यों नहीं सुनना चाहती मालेगांव बम धमाकों की आवाज?

विवेकानंद सिंह एक तरफ तो केंद्र की भाजपा  सरकार आपातकाल के दिनों को याद करते हुए आँसू बहा रही है। वहीं दूसरी तरफ मालेगाँव बम ब्लास्ट मामले में विशेष सरकारी वकील रोहिणी सालियान ने अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस को दिए साक्षात्कार में एक सनसनीखेज खुलासा किया है कि पिछले एक साल से, “जब से एनडीए सरकार सत्ता में आई है” उनके ऊपर काफी दबाव बनाया जा रहा हैं। उनपर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने दबाव बनाया कि वे इस मामले में नरम रवैया अपनाएं। अब आप ही बताइये क्या यह एक तरह का अघोषित आपातकाल नहीं है? अगर सच में सरकार का रवैया ऐसा है तो उस पर आप क्या कहेंगे?  इन कृत्यों से सरकार का न सिर्फ चाल, चरित्र और चेहरा सामने आता है, बल्कि यह आपातकाल पर बड़ी-बड़ी बातें करने का भी ढोंग सामने आता है। क्या कोर्ट में जिस मामले की सुनवाई हो रही उसे प्रभावित करने की कोशिश सरकारी मशीनरी की मनमानी करना नहीं है? हालांकि एनआईए ने इन आरोपों से इंकार किया है, लेकिन क्या इंकार कर देने भर को सच मान लिया जाय या फिर उस वकील को जिसने यह खुलासा किया है। इस मामले में सरकार की चुप्पी के क्या मायने हो सकते...